भारतीय संस्कृति में प्रेम का बदलता स्वरूप: पौराणिक आदर्शों से आधुनिक ‘लिव-इन’ और कोर्ट-मैरिज तक।

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डॉ. एस. के. फगेड़िया                                           सहायक आचार्य, लेखक                                              युवा समाजसेवी                                                      सीकर, राजस्थान

 

 

                 (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)                                                (w) 6395080071

 

       भारतीय संस्कृति में प्रेम का बदलता स्वरूप:                        पौराणिक आदर्शों से आधुनिक ‘लिव-इन’                                       और कोर्ट-मैरिज तक।

 

 

 

                    प्रेम मानव जीवन की सबसे सुंदर और नैसर्गिक भावना है। भारतीय संस्कृति में प्रेम को केवल एक शारीरिक या मानसिक आकर्षण नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक साधना माना गया है। प्राचीन ग्रंथों से लेकर आधुनिक समाज तक प्रेम की परिभाषा उसकी अभिव्यक्ति और उसे देखने के सामाजिक दृष्टिकोण में एक बहुत बड़ा बदलाव आया है। जहाँ एक ओर हमारे पास त्याग, मर्यादा और समर्पण पर आधारित ‘सीता-राम’ और ‘राधा-कृष्ण’ का दिव्य प्रेम है वहीं दूसरी ओर आज का युवा ‘लिव-इन रिलेशनशिप’, ‘नाबालिग प्रेम विवाह’ और ‘घर से भागने’ जैसी वास्तविकताओं से जूझ रहा है।

 

        पौराणिक और सांस्कृतिक आदर्श:

           त्याग, मर्यादा और अनन्य प्रेम।

 

               भारतीय संस्कृति में प्रेम के दो सबसे बड़े और गहरे स्तंभ हैं सीता-राम और राधा-कृष्ण । ये दोनों स्वरूप प्रेम के दो अलग-अलग लेकिन उतने ही पवित्र आयामों को दर्शाते हैं । श्री राम और माता सीता का प्रेम मर्यादा और कर्तव्य की नींव पर टिका है। इसमें वासना का कोई स्थान नहीं है बल्कि यह एक-दूसरे के प्रति संपूर्ण समर्पण और सम्मान का प्रतीक है । जब श्री राम को 14 वर्ष का वनवास मिलता है तो सीता महलों के ऐश्वर्य को छोड़कर उनके साथ कांटों भरे रास्तों पर चलने का निर्णय लेती हैं। श्री राम ने भी उस युग में एकपत्नी व्रत का पालन करके प्रेम और निष्ठा की सर्वोच्च मिसाल कायम की जहाँ राजाओं की कई पत्नियाँ होना आम बात थी। सीता-राम का प्रेम सिखाता है कि प्रेम का अर्थ केवल सुख भोगना नहीं बल्कि संकट के समय एक-दूसरे की ढाल बनना है।

                       राधा और कृष्ण का प्रेम सामाजिक बंधनों, विवाह के रीति-रिवाजों और सांसारिक नियमों से परे है। यह प्रेम की उस अवस्था को दर्शाता है जहाँ दो शरीर और एक आत्मा का भाव होता है। राधा और कृष्ण का विवाह नहीं हुआ फिर भी सदियों से कृष्ण के नाम से पहले राधा का नाम राधे-कृष्ण लिया जाता है । यह इस बात का प्रमाण है कि भारतीय संस्कृति में प्रेम को विवाह से भी ऊँचा स्थान दिया गया है, बशर्ते वह शुद्ध और निष्काम हो।

 

वर्तमान समय का प्रेम: आधुनिकता और भटकाव

 

         आज का युग तकनीक, सोशल मीडिया और वैश्वीकरण का युग है। जैसे-जैसे समाज बदला, वैसे-वैसे प्रेम की परिभाषा और उसकी अभिव्यक्ति भी बदल गई। आज का प्रेम “इंस्टेंट” तत्काल हो गया है। डेटिंग ऐप्स, चैटिंग और रील संस्कृति ने प्रेम की गहराई को काफी हद तक कम कर दिया है। आज के युवा अक्सर तात्कालिक शारीरिक या मानसिक आकर्षण को सच्चा प्रेम मान बैठते हैं। पौराणिक काल का प्रेम जहाँ धैर्य और प्रतीक्षा सिखाता था वहीं आज का प्रेम अधीरता और अधिकार पर आधारित हो गया है। आधुनिक युग में प्रेम व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रतीक बन गया है । आज के युवा अपनी पसंद-नापसंद को लेकर अधिक मुखर हैं जो एक अच्छी बात है, लेकिन कई बार इसमें परिपक्वता की कमी दिखाई देती है।

 

घर से भाग जाना और सामाजिक टकराव

 

                   वर्तमान समय में प्रेम के रास्ते में जब सामाजिक, धार्मिक या जातीय दीवारें खड़ी होती हैं तो कई प्रेमी जोड़े घर से भागने का रास्ता चुनते हैं। यह कदम भारतीय समाज के बदलते पारिवारिक ढांचे और युवा सोच के बीच के टकराव को दर्शाता है। परिवारों में माता-पिता और बच्चों के बीच खुलकर बात न हो पाना इसकी सबसे बड़ी वजह है। जब युवाओं को लगता है कि उनके परिवार वाले उनकी भावनाओं को नहीं समझेंगे तो वे डर या विद्रोह में आकर घर छोड़ देते हैं। फिल्मों और उपन्यासों में घर से भागकर शादी करने को बहुत ‘रोमांटिक’ दिखाया जाता है लेकिन वास्तविक जीवन इससे बिल्कुल अलग है। बिना आर्थिक स्थिरता और सामाजिक सहयोग के, घर से भागे हुए जोड़ों को अक्सर गंभीर आर्थिक तंगी, कानूनी मुकदमों और यहाँ तक कि ‘ऑनर किलिंग’ जैसे खतरों का सामना करना पड़ता है।

 

नाबालिग प्रेम विवाह

 

                  अक्सर किशोरावस्था में हार्मोंस के बदलाव और आकर्षण के कारण किशोर-किशोरी इसे ही अपना अंतिम सच मान लेते हैं। 14 से 17 वर्ष की आयु में मानसिक और भावनात्मक विकास पूरी तरह से नहीं हुआ होता है। इस उम्र में लिया गया शादी का फैसला अधिकांशतः गलत साबित होता है। भारतीय कानून के अनुसार विवाह के लिए लड़की की उम्र कम से कम 18 और लड़के की उम्र 21 वर्ष होनी चाहिए। नाबालिग विवाह कानूनन अपराध है। इसके अलावा, कम उम्र में विवाह और गर्भधारण से लड़कियों के स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ता है। कैरियर की शुरुआत होने से पहले ही जिम्मेदारी का बोझ युवाओं के भविष्य को अंधकार में धकेल देता है।

 

लिव-इन रिलेशनशिप

 

        बिना शादी किए एक साथ पति-पत्नी की तरह रहना। यह पूरी तरह से एक आधुनिक और मुख्य रूप से शहरी अवधारणा है, जो पश्चिमी देशों से भारत आई है। आज की पीढ़ी शादी के भारी-भरकम बंधनों और खर्चों से बचना चाहती है। वे शादी से पहले एक-दूसरे की आदतें, स्वभाव और अनुकूलता को परखना चाहते हैं ताकि भविष्य में तलाक जैसी नौबत न आए। भारतीय समाज आज भी लिव-इन को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाया है। इसे अक्सर नैतिक मूल्यों के पतन के रूप से देखा जाता है। हालांकि भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने लिव-इन रिलेशनशिप को अवैध नहीं माना है और इसमें रहने वाली महिलाओं व उनसे पैदा होने वाले बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए कई कानूनी दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं। इसके बावजूद, सुरक्षा और सामाजिक सम्मान के लिहाज से इसमें आज भी कई चुनौतियाँ हैं।

 

 निष्कर्ष: आदर्श और आधुनिकता का संतुलन जरूरी

 

            यदि हम सीता-राम और राधा-कृष्ण के प्रेम की तुलना आज के लिव-इन या नाबालिग प्रेम से करें तो सबसे बड़ा अंतर धैर्य जिम्मेदारी और सम्मान का है। प्राचीन प्रेम में समर्पण था जबकि आधुनिक प्रेम में कई बार केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ति मुख्य होती है। आज के समय में युवाओं को यह समझने की आवश्यकता है कि स्वतंत्रता का अर्थ जिम्मेदारी से भागना नहीं है। प्रेम करना गलत नहीं है लेकिन प्रेम के नाम पर अपने माता-पिता के भरोसे को तोड़ना, कानूनी सीमाओं का उल्लंघन करना जैसे नाबालिग विवाह या बिना सोचे-समझे जीवन के बड़े फैसले लेना अंततः दुःख का कारण बनता है।

           भारतीय संस्कृति रूढ़िवादी नहीं है यह समय के साथ बदलना जानती है। आवश्यकता इस बात की है कि आज की पीढ़ी आधुनिक जरूर बने लेकिन अपनी सांस्कृतिक जड़ों, मर्यादाओं और नैतिक मूल्यों को न भूले। प्रेम में जब तक सीता-राम जैसी मर्यादा और राधा-कृष्ण जैसा निश्छल भाव रहेगा, वह समाज को हमेशा सुंदर बनाता रहेगा।

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