राजेन्द्र रंजन गायकवाड (सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक) बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
कर्मफल (भाग 13)
कहते हैं कि कुछ लोग किताबों की तरह होते हैं बोलते नहीं, मगर ज़िंदगी का हर फ़लसफ़ा सिखा जाते हैं। हीरा के जीवन की खुली किताब को जिसने भी दूर से देखा, उसने बस उसके मौन को पढ़ा। मगर उस शांत चेहरे के पीछे संघर्ष की एक ऐसी इबारत लिखी थी, जिसे समझने के लिए दिल की आँखें चाहिए थीं। देखते ही देखते, उसने अपने जीवन के सुनहरे तीस साल पारिवारिक जिम्मेदारियों की भट्टी में झोंक दिए थे।
उम्र का एक लंबा हिस्सा सिमरिया और सागर की गलियों में, बीड़ी के पत्तों को सहेजते और मां पार्वती पति गणेश का जीवन तिली की लाल पत्थर खदानों पर धूप-छांव झेलते हुए बीत गया रहा है। भाई छेकोड़ी की दी हुई प्रताड़नाएं हों, गृहस्थी का भारी बोझ हो, या जुड़वां बच्चों में से देविका को हमेशा के लिए खो देने का असहनीय दर्द हीरा ने हर ज़हर को ‘मदर इंडिया’ के उस गीत की तरह गले से लगाया, जो उसने कभी रेडियो पर सुना था। वह टूटी, मगर कभी बिखरी नहीं है।
अब वक्त बदला था, हालात थोड़े संभले थे, लेकिन जिम्मेदारियों का पहाड़ अभी भी पूरी तरह टला नहीं था। छोटी चार बहिन की शादियों का कर्ज सिमरिया के सामंतों से लिया गया वह पुराना कर्ज चुकाने में गणेश और उसने अपने खून-पसीने की आखिरी बूंद तक बहा दी और आँखों में भविष्य के धुंधले सपने लिए, अब हीरा की थकी हुई लेकिन उम्मीद से भरी निगाहें अपने बेटे मुन्ना पर टिकी थीं।
मुन्ना, जो कभी स्कूल मास्टर की यातनाएं झेलकर रोते हुए घर आता था, आज वही मुन्ना हायर सेकेंडरी बोर्ड परीक्षा में प्रथम श्रेणी में पास होकर उसकी सबसे बड़ी ताकत बन चुका था। तब हीरा की आँखों से गिरे आंसुओं ने मुन्ना की कामयाबी की जो नींव रखी थी, वह अब एक मज़बूत इमारत में बदलने लगी थी। हीरा को मुन्ना से ढेरों उम्मीदें थीं। उसे पूरा भरोसा था कि उसका मुन्ना अब बड़ा होकर न केवल इस बचे-खुचे पारिवारिक कर्ज़ के कलंक को हमेशा के लिए धो डालेगा, बल्कि अपनी माँ की ममता और पिता के सीधेपन को एक नया आसमान देगा। एक ऐसा नया घर बनाएगा, जिसकी छत के नीचे तंगहाली की कभी न हो।
इसके साथ ही, हीरा के दिल का सबसे नाज़ुक कोना उसकी छोटा बेट देवीप्रसाद (देवी) के लिए धड़कता था। जिसकी बंद आँखों के इलाज के लिए उसने कभी बांस की टोकरी में रखकर डॉक्टरों के चक्कर काटे थे, आज उस देवी का स्वास्थ्य सुधर रहा था। हीरा की अब यही सबसे बड़ी हसरत थी कि मुन्ना बड़ा होकर अपने भाई देवी की आगे की पढ़ाई को पूरी मुस्तैदी से संभाले। उसे पढ़ा-लिखाकर इस काबिल बनाए कि वह दुनिया के सामने सर उठाकर जी सके, और फिर एक दिन पूरे मान-सम्मान के साथ उसका विवाह संपन्न कर दे। तीस सालों के लंबे पतझड़ के बाद, हीरा अब मुन्ना के रूप में अपने आँगन में उम्मीदों के नए वसंत की आहट सुन रही थी। इधर मुन्ना, अब राजन प्रथम श्रेणीबपास हुआ तो उसकी कक्षा की सबसे चुलबुली लड़की मुन्ना की किताब के आखिरी पन्ने पर लिखा,, मेरे प्रेम पत्र पढ़कर,, तुम नाराज़ न होना,, किताब के पन्ने मुन्ना ने खोले तो उसमें गुलाब के साथ एक पत्र रखा था।
(आगे का भाग कल)






