पंकज सीबी मिश्रा (प्रभारी सम्पादक) जौनपुर उ. प्र.।
दैवत्व की प्राप्ति के लिए दिखावा जरुरी नहीं।
दिवाली पर तारीख विवाद छोड़िए, भाव पूर्वक दीपोत्सव पर्व मनाइए। दिवाली के दिन महालक्ष्मी पूजन और दीपदान के बाद भगवान लक्ष्मीनारायण को भोग लगाकर फिर प्रसाद रूप भोजन कीजिए। लोगो में मिठाईया वितरित कीजिये, उपहार दीजिये। गीता में भगवान् कहते है – जो भक्त मेरे लिए प्रेम से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ, वह पत्र पुष्प आदि मैं ग्रहण करता हूँ, सवाल उठता है कि वे खाते कैसे हैं ? इसे समझना जरुरी है। हम जो भी भोजन ग्रहण करते है, वे जीवन की तरह पांच तत्वों से बनी हुई होती है। क्योकि हमारा शरीर भी पांच तत्वों से बना है, इसलिए अन्न, जल, वायु, प्रकाश और आकाश तत्व की हमें जरुरत है, जिसे हम अन्न और जल आदि के द्वारा प्राप्त करते हैं।परमात्मा तो संपूर्ण हैं, इस ब्रह्मांड के रचयिता हैं। वे तो भावनाओं का भी भोग लगा लेते हैं। इसी प्रकार पितृगण विवशता या दरिद्रता के कारण अपने वंशज के आंसुओं से भोग लगा तृप्त हो जाते हैं । लेकिन देवताओं का शरीर पांच तत्वों से नहीं बना होता । शास्त्र कहते हैं कि उनमे पृथ्वी और जल तत्व नहीं होता । परमात्मा के बारे में कहा तो यह भी गया है कि बिनु पग चलहिं सुनहीं बिनु काना। मध्यम स्तर के देवताओ का शरीर तीन तत्वों से तथा उत्तम स्तर के देवता का शरीर दो तत्व — तेज और आकाश से बना हुआ होता है। इसलिए देव शरीर वायुमय और तेजोमय होते हैं । यह देवता वायु के रूप में गंध, तेज के रूप में प्रकाश को ग्रहण और आकाश के रूप में शब्द को ग्रहण करत हैं। यानि देवता गंध, प्रकाश और शब्द के द्वारा भोग ग्रहण कर सकते हैं। जिसका विधान पूजा पद्धति में होता है । जैसे जो हम अन्न का भोग लगाते हैं, देवता उस अन्न की सुगंध को ग्रहण करते हैं, उसी से तृप्ति हो जाती है। जो पुष्प चढ़ाते हैं और धूप जलते हैं, उसकी सुगंध को भी देवता भोग के रूप में ग्रहण करते हैं । हम दीपक जलाते हैं, देवता उस प्रकाश तत्व को ग्रहण करते हैं। आरती का विधान भी उसी के लिए है। हम जो मन्त्र पाठ करते हैं, शंख बजाते हैं या घंटी घड़ियाल बजाते हैं, उसे देवता गण ”आकाश ” तत्व के रूप में ग्रहण करते हैं। पूजा में हम जो भी विधान करते हैं, उससे देवता वायु, तेज और आकाश तत्व के रूप में भोग ग्रहण करते हैं। यह पर्व आपको समृद्धि का एहसास कराता है और आपके पास रखें धन का सही उपयोग और आपको मानसिक संतुष्टि देता है। यह समय त्योहारों के हैं और अपनी शंकाओं के समाधान के भी हैं। आजकल एक ट्रेण्ड जोरों पर है कि दिवाली का सामान दिवाली मनाने वाले लोगो से खरीदे वहीं एक चुनावी जनसभा में एक उल जलूल नेता हिन्दुओं को ललकार कर कह रहा कि हिंदूओ कि माँ नें हिंदुस्तान पैदा नहीं किया। साधु सन्यासी महात्माओं का दिव्य ज्ञान लेने के बाद उन जैसा बनना और बनने का ढोंग करना आजकल का नया चलन सा बन गया है। दिवाली पर मान्यताओं का एक पूरा बाजार मुंह उठाए खड़ा है। सनातन में तो जिस प्रकृति का देवता हो, उसी प्रकृति का भोग लगाने का विधान है। इस तरह हिन्दू धर्म की पूजा पद्धति पूर्ण वैज्ञानिक है । शंका छोड़िए, अपने शास्त्रों और पुराणों में सब कुछ वर्णित है। देवताओं की तरह परमात्मा और पितृगण भी श्रद्धापूर्वक लगाया और दिया गया भोजन गृहण करते हैं। जिस प्रकार हमारे तीर्थ और हमारे मंदिर ग़ज़ब की ऊर्जा के केंद्र हैं, उसी प्रकार सनातन धर्म के पर्व भी प्रसन्नता और आनंद का सृजन करते हैं । इन दिनों सभी को उल्लास तथा उत्साह का दर्शन होता है । पर्वों का सीधा नाता भगवान से है। आज जिस प्रश्न पर बात कर रहे हैं, वह प्रश्न आप तौर पर सभी के जहन में उठता आया है। भगवान की रुचि रूप रस गंध स्पर्श भाव में है। देवी देवताओ का सर्व आव्ह्वान करना पड़ता है। विज्ञान मनुष्य के द्वारा उत्पादित तो है किन्तु ईश्वरीय सत्ता का जवाब नहीं है। हिन्दू धर्म में भगवान को भोग लगाने का विधान है। मन में आता है कि क्या सच में ईश्वर हमारा लगाया भोग ग्रहण करते हैं ? तो हाँ ईश्वर सब ग्रहण करता है केवल आपके अहंकार को छोड़कर। शुभ दिपावली और सबको आगामी दीपोत्सव की बधाई।







