सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री/लेखिका/शिक्षिका
नवापारा/राजिम, जिला-रायपुर, (छ.ग.)
(नया अध्याय, देहरादून)
अंतस की उड़ान! (कविता)
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डर की दीवारें तोड़ो,
झिझक के पिंजरे खोलो,
अंतस पुकारे जब,
फिर रुकना आसान नहीं होता।
रफ़्तार आहिस्ता ही सही,
पर यह उड़ान अब रुकेगी नहीं।
थकना मत, क्योंकि धैर्य व संतोष ही,
शिखर तक पहुँचने के सच्चे सारथी हैं।
अपने भीतर प्रेम व विश्वास की,
उस लौ को प्रज्वलित करो,
कि जीवन का हर कोना,
एक नई उमंग से खिल उठे।
अपने हर कदम को बहने दो,
निर्मल जल की उस धारा की तरह!
जो पत्थरों से टकराकर भी,
अपनी पवित्रता व राह नहीं बदलती।
मन के झरोखों को साफ़ रखो,
न वहाँ द्वेष की धूल हो,
न छल का अंधेरा।
कपट के बंधनों को तोड़कर,
बस! निस्वार्थ भाव से आगे बढ़ते चलो।
अपनी शख्सियत की खुशबू को,
इन फिजाओं में ऐसे बिखेरो!







