सौजन्य अजय प्रताप सिंह
(सम्पादक दिल्ली)
कवयित्री चन्द्रमती चतुर्वेदी
चन्दू
यु पी बस्ती, अयोध्या धाम
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
“मन छाय रही दुख की बदली, मोहि सूझत नाहि कोई डगरी
मन छाय रही दुख की बदली, मोहि सूझत नाहि कोई डगरी,
कैसे पार करूँ भवसागर, राह भई अति कठिन नगरी।
आस निरासा बीच खड़ी है, डोले मन की नैया मोरी,
पीर हृदय की बढ़ती जाए, नैनन नीर ढुरै हमरी ।
सुख के पंछी उड़ि गए सारे, सूनी लागे उपवन हमरी,
किससे कहूँ व्यथा उर की मैं, सुनत न कोई बात हमारी।
अँधियारा चारों ओर घिरा है, दीपक भी अब लौ है अधरी,
मन छाय रही दुख की बदली, मोहि सूझत नाहि कोई डगरी।
हे प्रभु! अब तो हाथ बढ़ाओ, तुम बिन कौन सुनै हमरी
नाम का आस तेरे लेकर, बैठी हूँ मैं शरण तुम्हारी।
दया दृष्टि की वर्षा कर दो, सूखी मन की बगिया नियरी,
कट जाएँ सब कष्ट हमारे, महके फिर जीवन हो सुघरी।
आशा का जब सूर्य उगेगा, छँट जाएगी यह गहरी बदली,
मन छाय रही दुख की बदली, मोहि सूझत नाहि कोई डगरी।
करुणा करके राह दिखा दो, बन जाय करम निमनी हमरी
तेरे चरणों में सुख पाऊँ, तुम ही हो मेरे सर की छतरी।
भक्ति भाव की ज्योति जला दो, मिट जाए रात गहन अँधेरी,
मन छाय रही दुख की बदली, मोहि सूझत नाहि कोई डगरी!






