भूगोल की अजेय शक्ति: राष्ट्रों का भाग्य कैसे तय करती है धरती।

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संजय सोंधी

(संयुक्त निदेशक)

शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार

 

 

             (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

भूगोल की अजेय शक्ति: राष्ट्रों का भाग्य कैसे तय करती है धरती।

 

भूगोल सिर्फ पहाड़ों, नदियों और नक्शों का संग्रह नहीं है। यह एक अदृश्य शक्ति है जो देशों की सीमाओं, उनकी समृद्धि और आपसी संघर्षों को गहराई से प्रभावित करती है। आज की आधुनिक दुनिया में जहां स्मार्टफोन, इंटरनेट और हवाई यात्राएं दूरियों को मिटा रही हैं, वहां भी कोई राष्ट्र अपने भौगोलिक स्थान, प्राकृतिक संसाधनों और सीमाओं से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकता। चाहे कितनी भी उन्नत तकनीक विकसित कर लें, धरती की वास्तविकताएं फैसले थोपती रहती हैं।

 

दुनिया के दस महत्वपूर्ण क्षेत्र आने वाले समय में वैश्विक राजनीति के केंद्र बनने वाले हैं। इनमें ऑस्ट्रेलिया, ईरान, सऊदी अरब, ब्रिटेन, ग्रीस, तुर्की, अफ्रीका का साहेल क्षेत्र, इथियोपिया, स्पेन और अंतरिक्ष शामिल हैं। इन इलाकों का विश्लेषण बताता है कि कैसे भूगोल इतिहास को दोहराता है और भविष्य को आकार देता है।

 

ऑस्ट्रेलिया एक विशाल द्वीप-महाद्वीप है, जो भौगोलिक रूप से अलग-थलग दिखता है, लेकिन रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण। एक तरफ यह अमेरिका का मजबूत सुरक्षा साझेदार है, तो दूसरी तरफ आर्थिक रूप से चीन पर निर्भर। चीन ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, जहां लौह अयस्क और कोयले का निर्यात होता है। 2020 के आसपास चीन के साथ तनाव के दौरान ऑस्ट्रेलिया को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा, जो साबित करता है कि भौगोलिक स्थिति दो महाशक्तियों के बीच दुविधा पैदा करती है। AUKUS समझौते के तहत अमेरिका-ब्रिटेन के साथ सबमरीन सौदे ने इस तनाव को और बढ़ाया है।

 

मध्य पूर्व में सऊदी अरब और ईरान के बीच संघर्ष केवल धार्मिक नहीं, बल्कि भौगोलिक है। फारस की खाड़ी और ह ORMuz जलडमरूमध्य पर नियंत्रण की लड़ाई है। दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल इसी संकीर्ण जलडमरूमध्य से गुजरता है—2024 में सऊदी अरब ने यहां से 5.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल निर्यात किया। ईरान की पहाड़ियां और रेगिस्तान इसे मजबूत बनाते हैं, जबकि सऊदी अरब तेल संसाधनों पर निर्भर है। कोई भी युद्ध यहां तेल की कीमतों को आसमान छूने पर मजबूर करता है।

 

अफ्रीका के साहेल क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन और मरुस्थलीकरण बड़े खतरे हैं। सहारा रेगिस्तान दक्षिण की ओर बढ़ रहा है, जिससे 300 मिलियन लोगों की आजीविका प्रभावित हो रही है। सूखा, गरीबी और आतंकवाद बढ़ रहे हैं, जो यूरोप की ओर प्रवासन को बढ़ावा देते हैं। इथियोपिया में नील नदी पर ग्रैंड Ethiopian रेनेसां डैम (GERD) ने मिस्र और सूडान के साथ तनाव बढ़ाया है। इथियोपिया नील का 86 प्रतिशत पानी योगदान करता है, लेकिन मिस्र अपनी 97 प्रतिशत पानी की जरूरत नील से पूरा करता है। जलवायु परिवर्तन से पानी की कमी बढ़ रही है, जो बड़े संघर्ष का कारण बन सकता है।

 

तुर्की और ग्रीस के बीच एजियन सागर और साइप्रस पर विवाद, स्पेन में कैटेलोनिया की अलगाववाद की मांग, ब्रिटेन में स्कॉटलैंड की स्वतंत्रता की आवाज—all भौगोलिक और ऐतिहासिक विभाजनों का नतीजा हैं।

 

सबसे रोचक है अंतरिक्ष का मोर्चा। पहले महासागरों और जमीन पर कब्जे के नियम अब उपग्रहों, चंद्रमा के संसाधनों और कक्षाओं पर लागू हो रहे हैं। अमेरिका, चीन और भारत उपग्रहों, चंद्रमा मिशनों और सैन्य क्षमताओं में निवेश कर रहे हैं। चीन का BeiDou नेविगेशन सिस्टम और चंद्रमा के दूरवर्ती हिस्से से सैंपल लाना इस दौड़ को दिखाता है। उपग्रह आज संचार, निगरानी और युद्ध में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

 

आज रूस-यूक्रेन युद्ध, ताइवान जलडमरूमध्य का तनाव और लाल सागर में हमले भूगोल की याद दिलाते हैं। महाशक्तियां सदियों पुराने चोक-पॉइंट्स—जैसे Hormuz, माल  acca या सुज—को नियंत्रित करने के लिए लड़ रही हैं। जलवायु परिवर्तन से समुद्र स्तर बढ़ रहा है, संसाधन सिकुड़ रहे हैं, जिससे भौगोलिक सीमाओं का महत्व और बढ़ गया है।

 

भूगोल हमें सिखाता है कि नेताओं के फैसले व्यक्तिगत इच्छा से ज्यादा देश की भौगोलिक मजबूरियों से बंधे होते हैं। डिजिटल दुनिया में रहते हुए भी हमारी सुरक्षा और नियति इसी भौतिक धरती से जुड़ी है। पहाड़, नदियां, समुद्र और आकाश हमें याद दिलाते रहते हैं—भूगोल कभी नहीं बदलता, सिर्फ उसकी शक्ति को समझने वाले ही आगे बढ़ते हैं।

(यह लेख टिम मार्शल की लिखी किताब “पावर ऑफ़ जियोग्राफी” पर आधारित है।)

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