कवयित्री चन्द्रमती चतुर्वेदी (चन्दू)
बस्ती, अयोध्या धाम
उत्तर प्रदेश
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
श्रृंगार रस रचना
तू है मेरा, मैं हूँ तेरी पहचान,
जग को ये बतलाएँ हम,
एक दूजे में बसती है जान,
यही अरज फरमाएँ हम।।
जब से तेरी प्रीत मिली है,
बदली मेरी तकदीर,
सूनी राहों में खिल उठे हैं,
चाहत के कश्मीर।
तेरी आँखों के सागर में,
डूब-डूब इतराएँ हम,
एक दूजे में बसती है जान,
यही अरज फरमाएँ हम।।
तेरी बातें मिसरी जैसी, तेरी हँसी बहार,
तेरे बिन लगता है जैसे, सूना सारा संसार।
तेरे सपनों की चौखट पर,
हर पल दीप जलाएँ हम,
एक दूजे में बसती है जान,
यही अरज फरमाएँ हम।।
चाँद गवाही देता अपनी, तारों का भी साथ,
जन्म-जन्म की डोर बनी है, तेरे मेरे हाथ।
प्रीत-नगर के पावन पथ पर,
संग-संग कदम बढ़ाएँ हम,
एक दूजे में बसती है जान,
यही अरज फरमाएँ हम।।
दूर भले हो जाओ मुझसे,
दिल से दूर कहाँ,
साँसों में तुम, धड़कन में तुम,
तुम बिन और कहाँ।
मन-मंदिर में प्रेम-दीप की ज्योति
सदा जगमाएँ हम,
एक दूजे में बसती है जान,
यही अरज फरमाएँ हम।।
राधा जैसी प्रीत हमारी,
कान्हा जैसा नेह,
जितना तुमको पढ़ती जाऊँ,
उतना गहरा स्नेह।
प्रेम-ग्रंथ के स्वर्णिम पन्ने,
मिलकर आज सजाएँ हम,
एक दूजे में बसती है जान,
यही अरज फरमाएँ हम।।
तू है मेरा, मैं हूँ तेरी पहचान,
जग को ये बतलाएँ हम,
एक दूजे में बसती है जान,
यही अरज फरमाएँ हम?



