राजकुमार कुम्भज, जवाहरमार्ग, इन्दौर
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
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थे की जगह हैं, हैं, कहते थे.
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बेहद जरूरी था सच बोलना
मगर थोड़ा कुछ ख़ुद को भी था तौलना
बोलने वालों के काटे जा रहे थे सिर
झूठ के खुल गये थे शो-रूम कई-कई
धूप थी, छुटपुट थी, बंदूकों के साये थे
बच्चे-बूढ़े, गरीब-अमीर सब घबराये थे
तय था कि सच था कि बोलना जरूरी था
कल नहीं, आज और अभी बोलना था
मुँह पर पहरे थे, ताले थे, घोटाले थे
जितने भी थे कद ऊँचे,आदमकद थे
आदरणीय थे, आदमखोर थे, हरामखोर थे
चटखारे लेते थे, चुप-चुप थे, चुगलखोर थे
हॅंसते थे,गाते थे, धर्म-ध्वजाएँ लहराते थे
लुच्ची-टुच्ची गोबर-मान्यताएँ अपनाते थे
कमीनो-बेईमानों की यात्राएँ निकालते थे
थे की जगह हैं, हैं, कहते थे.
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और लोहा है कि…..?
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मैं समझता हूँ और हारता हूँ
कि किधर हैं बहती हवाओं की दिशाएँ
न बदली हैं पहले, न बदल पा रहीं हैं अब
बारिश भीगती झोपड़ियों की कुल-दशाएँ
ख़ून और पसीने की जारी मूल कीमतें
न बदली हैं पहले, न बदल पा रही हैं अब
पक्ष और प्रतिपक्ष की स्याह-कार्रवाइयाँ
न बदली हैं पहले, न बदल पा रही हैं अब
सच और झूठ की निर्लज्ज-प्रतिस्पर्धाएँ
न बदली हैं पहले, न बदल पा रही हैं अब
बोलने और लिखने की शुभ्र-स्वतंत्रताएँ
न बदली हैं पहले, न बदल पा रही हैं अब
ऐसे में मैं तलाशता हूँ वे दो-चार आँखें
जो सिरे से देख सकें अंधेरे में वह एक सुई
जो कर सके सिलाई मेरी फटी बिवाई
शताब्दियाँ हुईं कि जहाँ से ठहर-ठहरकर
पाँव-पाँव रिसता ही रहता है गर्म लहू
और लोहा है कि…?
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