हेमचंद सकलानी देहरादून
(नया अध्याय, देहरादून)
कारगिल के शहीदों को शत शत नमन
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तप्ते रेगिस्तानों में बर्फीले पर्वत के आंगन में
तुम्हारे पदचाप ही तो सन्नाटे में
जीवन झलकाते हैं, संगीनों के
तूफानों से टकराकर तुम घर परिवार
सुख,सब कुछ भूल जब जीवन दांव लगाते हो
तभी तो सरहद जीत तिरंगा फहराते हो।
एक वह हैं जो राजनीति में आते हैं बिना
जख्म खाए जम के लूटपाट मचाते हैं
तैमूर चेंगेज नादिर सबको
एक साथ मात कर जाते हैं
तुम देश पर मर मिटने की कसम खाते हो
और अंतिम सांस तक निभाते हो।
एक वह हैं जो जाति धर्म में देश बांटते हैं और
हर आदमी को एक देश में बनाते हैं।
तुम राजनीति के सौदागर तो नहीं जो सारे
ऐश्वर्यों का सुख भोगोगे, देश सेवा का संकल्प लोगे
तो किस्मत में गोलियां भी लिखोगे।
फिर अचानक शहीद होते ही भरी दोपहरी
पसर जाता नीले वितान सन्नाटा तुम्हारे
घर के भीतर मन के अंदर अहसासों के भीतर
जीवन के सारे रंग हो जाते बदरंग।
अब कौन प्रतीक्षा करेगा दिवाली में घर पर
सीमाओं से कोई जवान घर लौटेगा,राहें
सूनी सूनी होंगी फिर भी हर कोई राह तकेगा।
जाने किसने भावों के भंवर जाल में
फंसकर सोचा होगा
शहीदों की मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले
तुम्हें भला याद क्यों कर कोई करेगा
नेताओं के नाम का कलमा तो
अब हर कोई यहां पढ़ेगा
तुम्हारी शहादत का कर्ज
भला कौन अदा कर सकेगा
तुम्हारे बलिदान का कर्ज तो इस देश के
कण कण पर रहेगा,कण-कण पर रहेगा।







