सुश्री सरोज कंसारी
लेखिका/कवयित्री/शिक्षिका
अध्यक्ष: दुर्गा शक्ति समिति,
गोबरा नवापारा, राजिम, रायपुर (छत्तीसगढ़)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
”बाँटते रहो मधुर मुस्कान”
(कविता)
हृदय में गुंजित वीणा की तार,
स्नेह की धुन में हर हो गान।
धारण अंतस में उत्कृष्ट विचार,
धूमिल न करो अपना व्यवहार।
जीवित होने का भी दो प्रमाण,
राष्ट्रहित में समर्पित ये प्राण।
मर्यादा ही होता जीवन का सार,
प्रबल भाव में एक-दूजे से संवाद।
श्रेष्ठ कर्म से नित रहें जुड़ाव,
मंजिल की रख सही पहचान।
राह में फिर न हो भटकाव,
जीवन तो है धूप और छाँव।
गम की एक नाव में हैं सब सवार,
मांझी बन चलना है उस पार।
एक अपनी ज़मीं और आसमान,
हौसलों की हो हरपल ही उड़ान।
धर्म व आध्यात्म की ही चलें राह,
तज हृदय से अब हर कुविचार।
इंद्रधनुषी छटा का हो आभास,
तरंगित होते रहें मन के एहसास।
अपनी संस्कृति का करें सम्मान,
गरीब और असहाय पर दें ध्यान।
धन-दौलत व पद का क्यूँ अभिमान,
सभी को बाँटते रहो मधुर मुस्कान।
चाहे आए मुश्किलों का तूफान,
मायूसी का न करो हरदम बखान।
किसी के काम आए जो वो इंसान,
सक्रिय और बनें सब जिम्मेदार।
सहयोग के लिए बढ़ाएँ हम हाथ,
किसी का न करें कभी अपमान।
खट्टे-मीठे व चटपटे जीवन के स्वाद,
संघर्षों के साये में आता है निखार॥







