बुरी है बुराई,,,                      (कहानी)

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राजेंद्र रंजन गायकवाड

(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक) 

रायपुर, छत्तीसगढ़

                (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

 

बुरी है बुराई,,,

                     (कहानी)

 

एक छोटे से गाँव में दो मित्र रहते थे रामू और श्यामू दोनों एक ही उम्र के थे, एक ही स्कूल में पढ़े थे और अब दोनों खेतों में काम करते थे। लेकिन स्वभाव में जमीन-आसमान का फर्क था।

रामू सुबह से शाम तक किसी-न-किसी की शिकायत करता रहता।

“देखा श्यामू, पड़ोसी ने अपनी बाड़/ मेढ़ सीधी नहीं की!”

“उस दुकानदार ने वजन कम तौला!”

“मुखियाजी ने गाँव के काम में घोटाला किया!”

“अरे वो महिला तो रोज़ झगड़ा करती है!”

दिन भर रामू की ज़बान किसी-न-किसी की बुराई में लगी रहती। शाम को जब घर लौटता तो थका-हारा और चिड़चिड़ा होता। खेत भी अधूरे रह जाते, घर का काम भी अधूरा। परिवार वाले भी उससे दूर रहने लगे।

श्यामू चुपचाप सुनता और मुस्कुरा देता। वह सुबह जल्दी उठकर अपने खेत में काम करता, गाँव के बुज़ुर्गों की मदद करता, बच्चों को पढ़ाता और जब भी कोई मुश्किल में होता, चुपचाप मदद कर देता।

एक दिन गाँव में भयंकर बाढ़ आई। नदी का पानी घरों में घुस गया। सब लोग घबराए हुए इधर-उधर भाग रहे थे। रामू भी भाग रहा था और चिल्ला रहा था “यह सरकार की लापरवाही है! गाँव वाले बेकार हैं! कोई मदद नहीं करता!”

तभी उसने देखा कि श्यामू पानी में कमर तक खड़ा होकर बूढ़ों और बच्चों को नाव पर चढ़ा रहा है। वह खुद थक चुका था, लेकिन रुक नहीं रहा था। कुछ युवक भी उसके साथ जुड़ गए। धीरे-धीरे पूरा गाँव संगठित हो गया। रात भर मेहनत करके उन्होंने कई घरों को बचा लिया।

सुबह जब पानी थोड़ा कम हुआ, तब रामू ने श्यामू से पूछा, “तू इतना क्यों करता है? इतनी मेहनत क्यों?”

श्यामू ने मुस्कुराते हुए कहा,

“भाई, हम जितना समय दूसरों की बुराई करने में लगाते हैं, अगर उतना ही समय अच्छाई में लगा दें, तो कुछ सार निकल आता है। बुराई करने से न तो पानी रुकता है, न घर बचते हैं। अच्छाई करने से दोनों काम हो जाते हैं दूसरों का और अपना भी।”

उस दिन के बाद रामू चुप हो गया। उसने अपनी ज़बान पर लगाम लगाई और हाथों को काम में लगा दिया। कुछ महीनों बाद गाँव वाले कहते “रामू अब पहले जैसा नहीं रहा। अब तो वह भी श्यामू जैसा काम करने लगा है और सच में, जब रामू ने बुराई का समय अच्छाई में लगाना शुरू किया, तो उसके खेत हरे हो गए, घर में खुशियाँ लौट आईं और गाँव में भी उसका सम्मान बढ़ गया।

क्योंकि समय तो एक ही है,, बुराई में लगाने से खाली हाथ रह जाते हैं, अच्छाई में लगाने से जीवन में सार/ अर्थ निकल आता है।

 

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