राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
मैनपाट, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
चिंता, चिता बना देती है
(कहानी)
एक शांत नगर में राघव नाम का एक धनी व्यापारी रहता था। उसके पास आलीशान मकान, बड़ा व्यापार और समाज में प्रतिष्ठा थी। लेकिन इतनी सुख-सुविधाओं के बाद भी राघव का मन हमेशा अशांत रहता था। वह दिन-रात व्यापार को और बढ़ाने, शत्रुओं से अपनी संपत्ति की रक्षा करने और आने वाले कल की चिंताओं में डूबा रहता था। चिंता ने उसकी रातों की नींद और दिन का चैन छीन लिया था।
एक दिन, नगर में एक बौद्ध भिक्षु का आगमन हुआ। उनके चेहरे पर एक असीम शांति और संतोष का भाव था। राघव अपनी मानसिक अशांति से छुटकारा पाने के लिए उनके पास पहुंचा।
राघव ने भिक्षु के चरणों में प्रणाम किया और अपनी व्यथा सुनाई, “हे महात्मन! मेरे पास सब कुछ है, फिर भी मेरा मन हर पल किसी न किसी अनहोनी की चिंता से व्याकुल रहता है। मुझे इस मानसिक पीड़ा से मुक्ति का मार्ग दिखाएं।”
भिक्षु मुस्कुराए और उन्होंने राघव से कहा, “राघव, आज शाम तुम मेरे साथ नदी किनारे आओ, तुम्हें तुम्हारी चिंता का समाधान वहीं मिलेगा।”
शाम को राघव भिक्षु के पास पहुंच गया। दोनों नदी के किनारे ठंडी रेत पर बैठ गए। सूरज ढल रहा था और आसमान में लालिमा बिखरी हुई थी। भिक्षु ने पास पड़ी एक सूखी लकड़ी उठाई और पानी के किनारे की गीली रेत पर एक सुंदर और बड़ा सा घर बनाने लगे। उन्होंने उस घर को सजाने में काफी समय लगाया।
राघव चुपचाप यह सब देख रहा था। जैसे ही घर बनकर तैयार हुआ, नदी की एक तेज लहर आई और पल भर में उस रेत के घर को बहाकर ले गई।
भिक्षु ने राघव की तरफ देखा और पूछा, राघव, क्या इस घर के मिटने से तुम्हें दुख हुआ?
राघव ने कहा, “नहीं महाराज, क्योंकि मैं जानता था कि यह रेत का घर अस्थाई है,लहर तो इसे एक न एक दिन मिटा ही देती।”
भिक्षु ने गंभीर स्वर में कहा -राघव, यही सत्य तुम्हारे इस जीवन का भी है। यह जीवन क्षणभंगुर (छणिक) है। जैसे रेत का वह घर पानी की एक लहर से मिट गया, वैसे ही हमारा यह शरीर और यह जीवन भी समय की एक लहर के साथ समाप्त हो जाएगा। जब कुछ भी स्थाई नहीं है, तो फिर चिंता किस बात की?”
राघव ने उत्सुकता से पूछा, “तो क्या इस जीवन का कोई मूल्य नहीं है?”
भिक्षु ने समझाया, मूल्य जीवन को व्यर्थ की चिंताओं में गंवाने में नहीं, बल्कि चिंतन करने और चेतना को जगाने में है। जब तुम इस बात का गहराई से चिंतन करोगे कि जीवन क्षणभर का है, तो तुम वर्तमान में जीना शुरू कर दोगे। चेतना जगाने का अर्थ है यह जानना कि तुम यह नश्वर शरीर या धन-दौलत नहीं हो, बल्कि तुम एक जागृत आत्मा हो। जब चेतना जागती है, तब अहंकार, भय और चिंता अपने आप विलीन हो जाते हैं।”
भिक्षु की बातों ने राघव के भीतर एक नई रोशनी जगा दी। उसे समझ आ गया कि भविष्य की चिंता में घुलकर वह अपने अनमोल वर्तमान को नष्ट कर रहा था। उसने गहरी सांस ली, उसके मन का बोझ हल्का हो चुका था। उसने अपनी चेतना को जगाने और जीवन के हर क्षण को सार्थकता व सेवा में बिताने का संकल्प लिया।
सीख: जीवन बहुत छोटा है। बीते हुए कल का पछतावा और आने वाले कल की चिंता केवल भ्रम हैं। सही मायनों में जीवन जीने के लिए आत्म-चिंतन करें, अपनी चेतना को जगाएं और बिना किसी भय या चिंता के वर्तमान में आनंदपूर्वक जिएं।






