सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री, लेखिका एवं शिक्षिका
रिपोर्टर एवं उद्घोषिका
नवापारा-राजिम, रायपुर (छ.ग.)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
आलेख:
”सावन है शिव कृपा का मास”
-सुश्री सरोज कंसारी
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बारिश की बूंदें, मनभावन मंद-मंद चलती शीतल हवाओं के बीच, सावन के महीने में शिवभक्ति में लीन समाज में आस्था और विश्वास का अद्भुत संगम होता है। मन में उमंग और उत्साह का एक नया संचार होता है। सावन के महीने में शिव जी ही प्रधान देव होते हैं। ऐसी मान्यता है कि शिव शंकर को यह मास बहुत प्रिय था, इसलिए श्रावण मास के सोमवार को विधि-विधानपूर्वक पूजन करने से वे अति प्रसन्न होते हैं। अपने नाम के अनुकूल ही भोलेनाथ भक्तों पर शीघ्र प्रसन्न होते हैं।
सावन लगते ही एक ओर काँवरियों का दल लोटे में जल भरकर, काँवर पकड़ ‘बोल बम’ के नारे लगाते हुए पैदल यात्रा करता है। शिवधाम तक जाने के लिए वे पैरों में पड़े छालों की भी परवाह नहीं करते। शिव दर्शन के लिए उत्सुक होकर वहाँ पहुँचकर जलाभिषेक करते हैं और आनंदित होते हैं। जगह-जगह भंडारे की व्यवस्था की जाती है, जहाँ कुछ देर रुककर भक्तगण प्रसाद ग्रहण करते हैं। शिव मंदिरों में महिलाओं, बच्चों और युवकों का ताँता लगा रहता है। शिव जी को दूध, भांग, धतूरा और नारियल अर्पित कर पूजन किया जाता है। अधिकांश लोग सावन मास के प्रत्येक सोमवार को उपवास रखकर शिव कृपा का लाभ लेते हैं।
भक्ति में असीम शक्ति होती है। यदि लगन, आस्था और विश्वास हो तो भक्ति के बल पर जीवन का उद्धार हो जाता है। भक्ति के शुद्ध और पवित्र होने पर जीवन में सदाचरण का सतत प्रवाह होता है। सबसे आवश्यक है सच्चाई की राह और भक्त का भगवान से प्रेम। प्रेम के कारण ही सुदामा और मीरा ने कृष्ण को पाया, शबरी ने राम को पाया और भक्त प्रह्लाद ने श्री हरि को पाया। जब भक्त ईश्वर के ध्यान और आराधना में डूब जाते हैं, तो उनमें सद्भाव स्वयं भर जाते हैं। मन में दया, क्षमा, करुणा, सहयोग, धर्म और श्रेष्ठ कर्म का संचार होता है।
ईश्वर के स्मरण से यह नश्वर दुनिया प्रतीत होती है, जहाँ मोह-माया का जाल बिछा है। पाप अपनी चरम सीमा पर है, अपनों से ही धोखा, बैर, नफरत और टकराव है। झूठे जज्बात हैं। स्वार्थ के लिए लोग किसी भी हद तक गिरने में संकोच नहीं करते। क्रोध, वासना और लालच में लिप्त मानवता अब धूमिल हो चुकी है।
इस भौतिक संसार में दिखावे की होड़ है। एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करना, जलन से हृदय व्यथित होता है। चारों ओर कलह, कराह और मानसिक तनाव है। ऐसी स्थिति में आज शांति केवल ईश्वर की सच्ची आराधना से ही मिलती है। भले ही सांसारिक जीवन यापन करें, लेकिन आंतरिक सुकून पाने के लिए आध्यात्मिक चिंतन करना अति आवश्यक है। भक्ति जीवन के कठिन पल में नवज्योति जलाती है। सकारात्मक भाव का संचार होता है, मन एकाग्र होता है और अनावश्यक बोझिल मानसिकता से बचाव होता है।
बाह्य आडंबर और भौतिकता की चकाचौंध से अलग ही दुनिया है- ईश्वर की भक्ति। जो उत्साह, उमंग और परमानंद प्रदान करती है। धन-दौलत एक दिन नष्ट हो जाएगी, लेकिन सद्विचार जीवन के हर मोड़ पर काम आते हैं। कुछ भी हो जाए, लेकिन संयमित जीवन जीने के लिए संतुलन स्थापित करना जरूरी है। त्याग और तपस्या से पूर्ण जीवन हर किसी के बस की बात नहीं। अपने व्यवहार को समाज, परिवार और राष्ट्र के अनुकूल बनाने के लिए भक्ति से शक्ति का स्रोत प्राप्त करना जरूरी है। चाहे किसी भी देवी-देवता को मानें, बस उन पर पूर्ण श्रद्धा रखें। आपके हृदय में स्वतः ही मानवीय गुणों का विकास होगा।
धार्मिक मान्यता के अनुसार शिव जी को बेलपत्र और उसका फल बहुत प्रिय है, इसलिए सावन के सोमवार को इसका विशेष महत्व होता है। ऐसी मान्यता है कि बेलपत्र के बिना शिव आराधना पूरी नहीं होती। बेल के वृक्ष में साक्षात शिव का वास होता है। घर में बेल का पेड़ लगाने से नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है। बेलपत्र की तीन पत्तियाँ भगवान शिव के तीन नेत्रों की प्रतीक हैं। मात्र बेलपत्र अर्पण करने से भी वे प्रसन्न हो जाते हैं, इसलिए उन्हें ‘आशुतोष’ कहा जाता है।
स्कंद पुराण में बेलपत्र के वृक्ष की उत्पत्ति के संबंध में कहा गया है कि एक बार माँ पार्वती ने अपनी उँगलियों से ललाट का पसीना पोंछकर उसे फेंक दिया। माँ के पसीने की कुछ बूँदें मंदार पर्वत पर गिरीं, उसी से बेलवृक्ष उत्पन्न हुआ।
पौराणिक कथाओं के अनुसार इसी मास में शिव जी ने समुद्र मंथन से निकले विष का पान किया, जिससे उनका कंठ नीला हो गया। तभी से शिव जी ‘नीलकंठ’ कहलाए।
भारतीय संस्कृति में प्रत्येक पर्व का विशेष महत्व है, जहाँ आपसी भाईचारे के दर्शन होते हैं। सावन माह में चारों ओर अध्यात्म की गंगा बहती है। भक्त और भगवान के बीच बहुत मधुर संबंध स्थापित होता है। साधु-संत और महात्मा अपने सुमधुर वचनों से शिव की महिमा का बखान करते हैं। दिनभर मंदिरों में भजन, कीर्तन और प्रवचन होते हैं। शिव ही सत्य और सुंदर हैं। शिव से सृष्टि का हर क्षण है। शिव ही प्राणों के आधार हैं। शिव में ही शक्ति का वास है। शिव ही सृजनहार हैं, पालनकर्ता हैं और प्रलय को भी रोकने वाले हैं।
ऐसी मान्यता है कि सावन मास में शिव चालीसा, शिव स्तोत्र, शिव महापुराण और महामृत्युंजय का जाप करने से रोग, शोक और दोष का नाश होता है। दुख-दरिद्रता दूर होती है, सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है और जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है। शिव मंत्र कल्याणकारी हैं ही, पर सावन में शिव जी भक्तों की मनोकामना शीघ्र पूर्ण करते हैं।…सावन मास में सभी शिव देवालयों की विशेष साज-सजावट और श्रृंगार किया जाता है। भक्तों के आने-जाने की अलग व्यवस्था होती है। मंदिर के सामने पूजन सामग्री की दुकानें लगाई जाती हैं। सावन मास के अंतिम सोमवार को सभी बच्चे, बुजुर्ग, युवा और विशेष रूप से महिलाएँ लंबी कतार बनाकर भव्य रूप से जलाभिषेक करती हैं, जिसकी भव्यता देखते ही बनती है। इसमें सभी भक्तगण बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं और शिव शंकर से आशीष प्राप्त करते हैं।






