राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
संतुलन
(कहानी)
दिल्ली के एक छोटे से को-वर्किंग स्पेस में रात के दो बज रहे थे। स्क्रीन की नीली रोशनी में चार लोग बैठे थे आर्यन, मीरा, कबीर और सारा। वे एक स्टार्टअप बना रहे थे। जिसका नाम था “संतुलन”। ऐप का मकसद था शहर की अव्यवस्था को कम करना ट्रैफिक जाम, कचरे के ढेर, पानी की कमी, और लोगों के बीच बढ़ती दूरी।
शुरू में सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन जैसे-जैसे प्रॉडक्ट फाइनल होने लगा, कमरे में एक अजीब सी बेचैनी फैल गई। आर्यन ने कहा, “हमको सबसे पहले एल्गोरिद्म को फोकस करना चाहिए। डेटा ही सब कुछ है।”
मीरा ने तुरंत जवाब दिया, “नहीं। यूजर एक्सपीरियंस पहले। लोग ऐप खोलकर तुरंत समझ सकें, नहीं तो डेटा का क्या मतलब?”
कबीर हँस पड़ा, “तुम दोनों गलत हो। हमें पैसे कमाने का मॉडल चाहिए। फ्री ऐप कब तक चलेगा?”
सारा चुप थी वह दीवार पर लगे व्हाइटबोर्ड को देख रही थी जहाँ उनके सपने रंग-बिरंगे मार्करों से लिखे थे लेकिन अब वे लाइनें एक-दूसरे से कट रही थीं। कमरा अव्यवस्था का अड्डा बन चुका था। कॉफी के कप बिखरे पड़े थे, कोड की फाइलें गड़बड़ थीं। हर कोई अपनी बात पर अड़ा था। असहमति इतनी गहरी हो गई थी कि वे एक-दूसरे की बात सुनना भी बंद कर चुके थे। रात गहरी होती गई, और कमरे में सिर्फ कीबोर्ड की थप-थप और गुस्से भरी साँसें गूँज रही थीं।
तभी बिजली चली गई, अचानक पूरा स्पेस अंधेरे में डूब गया। जनरेटर भी फेल हो गया। चारों अँधेरे में बैठे रह गए।
कुछ देर तक सन्नाटा रहा फिर सारा की आवाज़ आई, धीमी लेकिन साफ
“सुनो… हम अव्यवस्था से लड़ने आए थे, लेकिन खुद उसी में डूब गए। देखो, जब सब कुछ व्यवस्थित था, तब भी हम सहमत नहीं हो पाए। शायद असहमति अव्यवस्था से पैदा होती है और सहमति… सृजन से।
आर्यन ने मोबाइल की टॉर्च जलाई। रोशनी में सारा के चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी। उसने व्हाइटबोर्ड पर एक नई लाइन खींची सिर्फ एक शब्द: “साथ” सबका सच्चे दिल से।
फिर उन्होंने कुछ अलग किया, कोड लिखना बंद कर दिया, बहस बंद कर दी। उन्होंने एक-दूसरे से पूछा -तुम्हें इस ऐप में सबसे ज़्यादा क्या चाहिए? तुम किस समस्या को सबसे पहले हल करना चाहते हो?
अगर हम तीन दिन में सिर्फ एक छोटी चीज़ बना सकें, तो वो क्या हो? रात भर वे बात करते रहे। बिना स्क्रीन के, बिना प्रेजेंटेशन के। सिर्फ शब्दों से,धीरे-धीरे विचारों के बीच पुल बनने लगे। अव्यवस्था के बीच से एक नया विचार निकला एक बहुत छोटा फीचर पड़ोसियों को एक-दूसरे से जोड़ने वाला सिंपल चैट बॉट, जो लोकल समस्याओं को साथ मिलकर हल करने में मदद करे।
सुबह होने से पहले उन्होंने मिलकर उस छोटे से फीचर का प्रोटोटाइप बना लिया, कोड साफ़ था। डिज़ाइन सादा था और सबसे महत्वपूर्ण चारों उस पर सहमत थे।
जब बिजली आई, स्क्रीन जल उठी ऐप का पहला वर्शन लाइव हो गया, कुछ घंटों में ही पड़ोस के लोग जुड़ने लगे। कोई पानी की टंकी की शिकायत कर रहा था, कोई टूटी सड़क की और कोई मदद करने के लिए आगे आ रहा था कोई अपने तरीके से अव्यवस्था का विरोध कर रहा था।
आर्यन ने धीरे से कहा, “हम अव्यवस्था से असहमति तक पहुँचे थे लेकिन जब हमने कुछ नया सृजन किया तो सहमति खुद आ गई।
मीरा मुस्कुराई, शायद असली संतुलन बहस में नहीं, मिलकर कुछ बनाने में होता है।
बाहर सूरज निकल रहा था। कमरे में अब अव्यवस्था नहीं थी, सिर्फ चार लोग थे, और उनके बीच एक साझा सृजन जो असहमति को सहमति में बदल चुका था। उसी दिन से “संतुलन” सिर्फ एक ऐप नहीं रह गया। वह एक याद बन गया कि अव्यवस्था असहमति लाती है, लेकिन सार्थक सृजन सहमति को स्थायी जन्म देता है।







