राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
उम्र बिना रुके, सफ़र कर रही है,
और हम हैं, चाहतें सजाकर बैठे हैं।
पल छिन रहे हैं, साँसें गिनती करती हैं,
हम तो अधूरे ख्वाबों को संवारे बैठे हैं।
मौसम बदलते हैं, रास्ते नए निकलते हैं,
हम पुरानी गली में इंतजार किए बैठे हैं।
सूरज हर सुबह, एक नया उजाला लाता है,
हम रात की बाकी, बची लौ को थामे बैठे हैं।
वक़्त कभी नहीं रुकता, न किसी को ठहरता,
हम सिर्फ़ यादों और उम्मीदों से लिपटे बैठे हैं।






