राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
मैनपाट, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
मनीप्लांट
(कविता)
मनीप्लांट का पौधा, लगाता रहा उम्र भर,
मिट्टी में सभी उँगलियाँ गड़ाता रहा उम्र भर
हर सुबह पानी देता, हर शाम दुआ करता,
कि शायद कल कोई पत्ती हरे रंग की फूटे।
पर हवाएँ चलीं ऐसी मौसम की
एक जड़ों को ही सूखा जाती,
हां, कुछ सूखी अनमनी जड़ें बच जाती
दो चार कोंपलें फूटती दिखीं एक दिन
और बारिश आई तो पत्तियां हरी भी हुईं
फिर धूप आई तो झुलसा दी पत्तियां
मनीप्लांट तो आशाएँ दिखाता रहा,
पर असली मनी कभी उगी ही नहीं,
मसलन श्रम की फसल सूखती रही,
जिंदगी भर जेब खाली-खाली रही।
अब बूढ़े हाथों में महज मिट्टी है,
और आँखों में है, वो पुराना सपना,
शायद जो कभी हरा होने वाला था,
आज भी रोपता हूँ हर तरीके से
हर मौसम में दो चार मनीप्लांटस
क्योंकि बोये/ रोपे बिना तो
कुछ भी उगता नहीं ‘रंजन’
शायद किसी दिन हवा रुख बदल लें
सच में उग आए मनी, मनीप्लांट में,,







