करुण कथा

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आचार्य अवधेश झा 

गंघटी आश्रम, धर्मागत पुर

पिलखी मुरौल, मुजफ्फरपुर 

 

                    (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)                                             (w) 6395080071

 

करुण कथा

         *******

इस संसार में आख़िर स्त्री का है कौन!

युवावस्था में कई मित्र आते जाते हैं,

कहानियां होती है!! 

पर हकीक़त कुछ और होता है!

फिर शादी ब्याह घर परिवार!!

फिर तो माहौल हीं अलग होता है!

पुरानी यादें बहुत सी बातें जिसे न भुलाया जा सकता है!!

उसे भुलने के बजाए दबाकर रखते हुए परिवार में सामंजस्यपूर्ण माहौल में ढलना!

वाह अद्भुत यह एक महिला हीं कर सकती है,

हकीक़त में स्त्री पृथ्वी माता का हीं रूप है!

जैसे चाहो जितना ज्यादती करो सब सह लेती है!

स्री बड़ी सहनशील होती है!

मानों अगर स्त्री न होती तो दुनियां कैसी होती !

इस संसार की कल्पना हीं अधुरी रहती!

मां

बुआ

बहन 

पत्नि

पुत्री

इन पांच रूपों से हीं बस स्त्री का चित्रण कीजिए!

तो इस संसार को सुन्दर बनाने में मातृ सक्ति का हीं पूर्ण योगदान हैं स्पष्ट हो जाता है?

यह सृष्टि हीं स्त्रीमय है?

पुरुष इसके केवल सहयोग मात्र में हीं निहित है!

आज कलियुग में स्त्री या मातृ सक्ति के विषय में लिख पाना बहुत हीं कठिन कार्य है!

इस समय चारित्रिक दौर्बल्यता से पूर्ण मानव समाज,

किस और जा रहा है ,

यह कहना उचित प्रतीत नही होता!

फिर भी समाजिक प्रहरी का दायित्व ,

कुछ लिख लेने को विवश कर रहा है।

आज समाज में भययुक्त वातावरण है

सब लोग खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं!!

 इस परिवेश में मातृशक्ति को और सजग होने की आवश्यकता है?

विशेष तौर से यह जानना जरूरी है की,

जीवन के प्रथम पराव युवावस्था से आगे आने पर,

 कई सारे मोड़ पर कुछ गलतियां होती होंगी जिन्हें भुलाकर हर जगह संघर्षशील होते हुए विद्यालय 

शिक्षण संस्थान, और विश्वविद्यालय से होते हुए, 

जिंदगी न जाने किन किन पथरीली राश्तों से भटकती हुई आगे निकलती है?

फिर आता है दाम्पत्य जीवन!

यहां मां बाप भाई परिवार को त्यागकर, 

किसी अन्य के साथ जीवन को समर्पित भाव से न केवल प्रेषित करना,

वरण उस परिवार को अपनाकर उसी में रमना,

यह कला हीं स्त्री को सहनशीलता की मूर्त रूप मातृ शक्ति के रूप में परिवर्तित कर सकती है ।

यह अदम्य साहस का कार्य कोई और नहीं कर सकता।

मातृ सक्ति हीं यह सब कर सकती है?

इस बीच जीवन की उधेर बुन में गिरता तरता आगे बढ़कर कब एक युवती से मां की जिम्मेदारी आ जाती है पता नहिं चलता।

बारिकियां ये है की इस बीच बहुत से रास्ते भटकाव के आते हैं?

पर जो अपनी इच्छा शक्ति को स्थिर रख सके उसे हीं मातृ शक्ति कहां गया है?

अब प्रश्न ये है की स्त्री का है कौन

बुढ़ापे में ना बेटा काम आता है!

 न बहु काम आती है!!

जो जीवन भर साथ चलने की कस्मे खाकर हाथ पकड़कर लाता है !

वो हीं साथ निभाता है!!

झूठ

 फरेब 

यारी 

दोस्ती 

मस्ती 

सब 20से पचास तक 

उसके बाद कमर झुकेगी 

तो वही याद आएगा जिससे बात बात पर ताना मारा करते हो!

कुछ हीं खुश नसीब इंसान हैं जमाने में !

जिनकी बीवियां सवाल नहीं करती!!

आखिर परिवार पालने के लिए जमाने भर से लड़कर,

 थक हार कर आया पति,

 तुम्हारे उस उलूल जूलूल व्यवहार से आखिर परेशान हीं तो होगा न।

हर रोज जब ऐसा होगा रात की निंद जाने लगेगी,

 चैन खोने लगेगा, 

फिर तो वह सोने को बेचैन होगा !

फिर घर परिवार सब कुछ छोड़कर,

 कहीं चैन की आगोश में न चाहते हुए भी सो जाएगा,

 तब तुम्हारी दुनियां हँसी के लिए तरस जाएगी।

पर तुम फिर उठ जाओगे !

अपनी राह चलोगे?

वक्त से मुकाबला करोगे।

सब कुछ संभालोगे।

सब कुछ!

पर बुढ़ापे में तुम्हारा कौन ख्याल रखेगा।

स्त्री सब कुछ कर सकती है !

सब कुछ सह सकती है?

पुरुष कजोर होते हैं।

वो अपनों के ताने बर्दास्त नहीं कर पाते,

 टूट जाते हैं,

 इसलिए हाथ जोड़कर विनती करता हूँ!अपने थके पति को हंस कर मुस्कुराकर उसके दिन भर के थकान को मिटाने के लिए।

हंसी खुशी का माहौल बनाकर रखिए,

कभी अपने पति को टूटने मत देना! 

उसे जवानी कासहारा न समझ,

 बुढापे की लाठी समझो ,

वही तुम्हारा सब कुछ है ,

उसकेथकान को दूर करने का प्रयास करिये?

उन्हे बोझिल मत होने दीजिए। 

जो कल खुद का बोझ भी न उठा पाए।।

और आपको बीच रास्ते में हीं छोड़कर सो जाए। 

“मातृ सक्ति को बारंबार नमन वन्दन”

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