काव्य: दार्शनिक सूर्य
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w) 6395080071
सहेजते ही जाना रे!
जो कहना है,
कह डालो,
सीधा,
शांति से।
जो करना है,
कर डालो,
बिना शोर के।
न घुमाओ बातों को,
न चीखो,
न तोड़ो,
न मरोड़ो।
बस…
उसे समझो,
उसे सच में समझो।
और जो भी कहो,
उसे हवा में मत छोड़ो,
उसे अनुभव बनाओ,
स्मृति बनाओ,
और हृदय में सहेज कर रखो।
ये क्षण गाने जीने के लिए हैं!
(यह कविता गहरी दार्शनिकता तथा वैचारिकता से ओत-प्रोत है। यह आदर्श व्यक्तित्व के धनी, महान् हिंदी साहित्यकार, आध्यात्मिक दार्शनिक, मानवतावादी सुधारक तथा संस्कृति व समरसता के संरक्षक, युगपुरुष ‘सूर्य जी’ द्वारा रचित है।)





