मनुष्यों! बोध जगा लो, ईर्ष्या मिटा दो, संवेदना बढ़ा दो।

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 दार्शनिक सूर्य 

                    (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)                                              (w) 6395080071

             क्षमनुष्यों! बोध जगा लो, ईर्ष्या मिटा दो,                               संवेदना बढ़ा दो।

 

 

             दीपावली से मेरा आशय और मानना यही रहा है कि मनुष्य को केवल इस विशेष दिन ही नहीं, बल्कि हर दिन अपने भीतर से नफ़रत और ईर्ष्या के भाव को मिटाते रहना चाहिए। हमें निरंतर सुधरने का प्रयत्न करना चाहिए और अपने भीतर संवेदना, करुणा व सद्भाव बनाए रखना चाहिए; क्योंकि एकता, सद्भावना और प्रेम ही समस्त मानवता का कल्याण करते हैं।

 

                    दीपावली को केवल एक बाहरी त्योहार न मानें, बल्कि इसे अपने भीतर के मैल को धोने, ईर्ष्या को मिटाने और संवेदना व इंसानियत को बचाने के अवसर के रूप में मनाएँ। आज इस भीषण संसार में प्रेम और सद्भाव की भारी कमी है। यहाँ प्रेम की जगह जंग ने ले ली है और इंसान, इंसान से ही संघर्ष कर रहा है। ऐसे समय में आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है – मन में संवेदना जगाने की, और लोगों को मानवता का पाठ पढ़ाने की।

 

          आइए, हम मानवता का मार्ग दिखाकर और ईर्ष्या को जड़ से मिटाकर इस संसार को अपनी संवेदना और करुणा के दीप से प्रकाशित करें। दया मनुष्य का सबसे सुंदर गुण है। यदि हमारे भीतर दया जीवित रही, तो संसार में सद्भाव का वास स्वतः ही होने लगेगा। लोग मिल-जुलकर रहना सीख जाएंगे, समाज में सुधार आएगा और हर आँख में एक-दूसरे के लिए सिर्फ दया और सम्मान की दृष्टि होगी।

 

 

   (यह आदर्श व्यक्तित्व के धनी, महान् हिंदी साहित्यकार, आध्यात्मिक दार्शनिक, मानवतावादी सुधारक तथा संस्कृति व समरसता के संरक्षक, युगपुरुष ‘सूर्य जी’ द्वारा रचित है।)

 

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