क्या भाजपा और ओवैसी में सशर्त सहमति है?

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राजकुमार कुम्भज                                         जवाहरमार्ग, इन्दौर

 

                     (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)                                              (w) 6395080071

 

 

   क्या भाजपा और ओवैसी में सशर्त सहमति है?

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       ये देखा जाना राजनीतिक पंडितों के लिए खासतौर से दिलचस्प प्रकरण हो सकता है कि चुनावी-दृष्टिकोण के खास संदर्भ में, क्या भाजपा और ओवैसी में कोई खास सशर्त आपसी सहमति बनी रहती है?

 

              उत्तरप्रदेश में ओवैसी फ़ैक्टर के आगमन से पहले तकनीकीतौर पर तकरीबन 68 मुस्लिम विधायक हुआ करते थे, जो घटकर शायद 38 पर सिमट गये हैं। आकस्मिक नहीं है कि मुस्लिम समुदाय के विधायकों का यह संख्या-बल ओवैसी फैक्टर की वजह से संकट महसूस कर रहा है। कौन नहीं जानता है कि ओवैसी हैदराबाद की बजाय लखनऊ को अपनी राजनीति का अखाड़ा बनाने में कुछ अधिक दिलचस्पी रखते हैं और निहायत ही गैर-जिम्मेदार खूबसूरती से अपने ही समुदाय के हितों को ठसाठस ठेस पहुँचाने में मुब्तिला पाये जाते हैं।

 

           वे लगभग परंपरागत शास्त्रीय अंदाज में दहाड़ते हुए दोहराते हैं कि उनका मुसलमान अब दरी नहीं बिछाएगा। पंचर नहीं लगाएगा। चुनाव लड़ेगा। विधायक बनेगा.सरकार बनाएगा। सरकार में हिस्सेदारी पाएगा। कौम की रहनुमाई करेगा। यहाँ मुस्लिमों के स्वघोषित ईमानदार नेता के इन तमाम जुमलों को डी-कोड करना इसलिए बेहद जरूरी हो जाता है कि देश की संपूर्ण राजनीति में मुस्लिम समुदाय की वोटिंग उपस्थिति हमेशा ही थोकबंद और निर्णायक रही है।

 

             उधर अमेरिका के मध्यावधि चुनावों में अब्दुल की जीत को, इधर भारत में बैरिस्टर ओवैसी साहब अपनी बी टीम राजनीति का पंजीकृत पंचरँगी परचम बनाकर अति-उत्साहित हो रहे हैं। वे देश और दुनिया को मंद-मंद मुस्कुराते हुए बेहतर समझा रहे हैं कि लोग-बाग जिस अब्दुल को लापता बताते हुए थकते नहीं थे, वह अब्दुल मिल गया है। अब अब्दुल लड़ेगा भी और जीतेगा भी, लेकिन बैरिस्टर ओवैसी साहब कभी ये नहीं बताते हैं कि उनकी उपस्थिति ने इससे पहले कितने मुस्लिम उम्मीदवारों को हरवाया है?

 

                 ये देखा जाना जरा भी असामान्य विस्मयकारी विचित्रताओं भरी आकस्मिकता नहीं हो सकती है कि लगभग जहाँ-जहाँ भाजपा के सामने मुस्लिम उम्मीदवार के पक्ष में ओवैसी ने प्रचार किया, वहाँ-वहाँ मुस्लिम उम्मीदवार हारता रहा है और भाजपा की जीत दर्ज होती रही है? इस बार उत्तरप्रदेश के चुनावी रण-क्षेत्र का मुक़ाबला हैदराबादी अब्दुल विरुद्ध लखनवी अब्दुल वाया अमेरिकी अब्दुल बनाया जा रहा है।

 

            अभी कहना मुश्किल है कि उत्तरप्रदेश की उर्वरा सरजमीन, आगामी चुनावों के दौरान, कटुतापूर्ण आरोप-प्रत्यारोप से किस हद‌ तक लहू-लुहान हो सकती है? राजनीति की धर्मनिरपेक्षता का आग्रह क्या होगा?आपसी भाईचारे को कौन, कहाँ तक दूषित करेगा? सामान्य जीवन की सहमति-असहमति के परखच्चे कितनी दूर तक उड़ाये जाएँगे?

 

                विपक्षी दल ओवैसी पर लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि वे भाजपा की बी टीम हैं। दोनों ही एक-दूसरे के खिलाफ हिंदू-मुस्लिम का डरावना-काॅर्ड खेलते रहते हैं, जबकि विकसित सच्चाई कुछ और ही दिखाई देती है। उदाहरण के लिए हैदराबाद स्थित पुरातात्विक महत्व की वैश्विक धरोहर चार मीनार (1591) को बहस के केंद्र रखकर जरा कुछ शाब्दिक-चाकूबाजी देखी जा सकती है।

 

     यूनेस्को द्वारा संरक्षित और जग प्रसिद्ध हैदराबाद की खास पहचान चार मीनार को कौन नहीं जानता है? पंद्रह बरस पहले तक वहाँ उसके आसपास दूर-दूर तक कभी कोई मंदिर नहीं था। चालीस बरस पहले देखा जाता था कि चार मीनार के एक कोने में रखे एक पत्थर पर कुछ औरतें सिंदूर लगाकर लौट जाती थीं, लेकिन एक दिन एक ट्रक की टक्कर से वो पत्थर उछलकर जब दूर चला गया, तो उस अनाम पत्थर के स्थान पर एक मूर्ति रख दी गई और पूजा -पाठ शुरू हो गया। फिर दँगे होते हैं और जब-जब दँगे होते हैं, मंदिर का आकार बढ़ता जाता है।

 

          एक ओर जहाँ मंदिर में पूजा-पाठ और दर्शकों की भीड़ आमतौर पर उमड़ती रहती है, वहीं दूसरी ओर चार मीनार के ही एक दूसरे हिस्से में निर्मित पुरानी मस्जिद की नमाज खासतौर पर प्रतिबंधित है। सामान्य विवाद की चिंगारी को हवा देना कोई खास मुश्किल टारगेट नहीं है।

 

      आज चार मीनार की एक मीनार से सटकर “भाग्य लक्ष्मी” नाम का एक बड़ा-सा मंदिर जहाँ दिखाई दे रहा है, वहाँ दिन-रात भक्त-सेना दर्शनार्थियों की एक बड़ी-सी भीड़ जमा होती रहती है। गौरतलब है कि हैदराबाद के उक्त अघोषित विवादास्पद स्थल स्थित भाग्य लक्ष्मी मंदिर के विशेष दर्शनार्थियों में भारत के गृहमंत्री अमित शाह और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ शामिल हैं। खास तौर से काबिल-ए-गौर सच्चाई ये है कि इस तमाम प्रकरण में बैरिस्टर ओवैसी साहब बिल्कुल खामोश हैं।

 

               कहीं ऐसा तो नहीं है कि उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनावों से कुछ पहले, देश के सामने एक बड़े साम्प्रदायिक-विवाद को, राष्ट्रीय बहस सहित, मनोरंजन का विषय बना दिए जाने की कुचालें चली जा रही हैं, जिसके लिए भाजपा और बैरिस्टर ओवैसी साहब के बीच समझने-समझाने की आपसदारी वाली सशर्त सहमति है?

 

 

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