ऊखीमठः मदमहेश्वर घाटी के ग्रामीणों की अराध्य देवी व प्रकृति की सुरम्य वादियों के मध्य रासी गाँव में विराजमान भगवती राकेश्वरी के मन्दिर में आगामी 16 जुलाई से सावन मास की संक्रान्ति से शुरू होने वाले पौराणिक जागरों के गायन की सभी तैयारियां शुरू कर दी गयी है!

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सम्पादक रुद्रप्रयागः लक्ष्मण सिंह नेगी

 

 

               (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

           

 

ऊखीमठः मदमहेश्वर घाटी के ग्रामीणों की अराध्य देवी व प्रकृति की सुरम्य वादियों के मध्य रासी गाँव में विराजमान भगवती राकेश्वरी के मन्दिर में आगामी 16 जुलाई से सावन मास की संक्रान्ति से शुरू होने वाले पौराणिक जागरों के गायन की सभी तैयारियां शुरू कर दी गयी है! युगों से चली आ रही परम्परा के अनुसार भगवती राकेश्वरी के मन्दिर में सावन मास की संक्रांति को पौराणिक जागरों का शुभारंभ किया जाता है तथा पौराणिक जागरो का गायन प्रतिदिन सांय सात बजे से आठ बजे तक किया जाता है दो माह तक चलने वाले पौराणिक जागरों का समापन आश्विन माह की दो गते को भगवती राकेश्वरी को ब्रह्म कमल अर्पित करने के बाद होता है! भगवती राकेश्वरी के मन्दिर में पौराणिक जागरों के गायन से रासी गाँव सहित मदमहेश्वर घाटी का वातावरण दो माह तक भक्तिमय बना रहता है। राकेश्वरी मन्दिर समिति कार्यकारी अध्यक्ष मदन भट्ट ने बताया कि आगामी सावन मास में भगवती राकेश्वरी के मन्दिर में पौराणिक जागरों का गायन पौराणिक परम्परा के अनुसार विशेष पूजा – अर्चना व वेद ऋचाओं के साथ शुरू किया जायेगा तथा पौराणिक जागरो के शुभारंभ अवसर पर ग्रामीणों द्वारा भगवती राकेश्वरी सहित पंच नाम देवी – देवताओं का आवाहन कर विश्व समृद्धि व क्षेत्र के खुशहाली की कामना की जायेगी तथा भगवती राकेश्वरी को अनेक प्रकार के भोग अर्पित किये जायेंगे ! राकेश्वरी मन्दिर समिति संरक्षक जगत सिंह पंवार ने बताया कि मदमहेश्वर घाटी के अन्तर्गत सिर्फ राकेश्वरी मन्दिर में ही पौराणिक जागरो की परम्परा जीवित है! राकेश्वरी मन्दिर समिति सचिव दलीप रावत ने बताया कि भगवती राकेश्वरी के मन्दिर में पौराणिक जागरो के गायन से दो माह तक रासी गाँव सहित मदमहेश्वर घाटी का वातावरण भक्तिमय बना रहता है तथा सभी ग्रामीण बढ – चढ़कर भागीदारी करते है। शिक्षाविद रवीन्द्र भटट् ने बताया कि भगवती राकेश्वरी के मन्दिर में पौराणिक जागरो के गायन की परम्परा युगों पूर्व की है तथा ग्रामीणों द्वारा पौराणिक जागरो के गायन की परम्परा का निर्वहन आज भी निस्वार्थ भावना से किया जाता है! युगों से जागर गायन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पूर्ण सिंह पंवार ने बताया कि भगवती राकेश्वरी के मन्दिर में दो माह तक चलने वाले पौराणिक जागरो के माध्यम से भगवान शंकर, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र, भगवान श्रीकृष्ण की जीवन लीलाओं के वर्णन के साथ तैतीस कोटि – देवी – देवताओं का आवाहन किया जाता है!

 

क्षेत्र पंचायत सदस्य रेशमा भट्ट ने बताया कि दो माह तक चलने वाले पौराणिक जागरो के गायन में धीरे – धीरे युवा पीढ़ी भी अपना योगदान देकर भविष्य के लिए परम्परा को जीवित रखने की रूचि रख रही है! तीलू रौतेली पुरुष्कार से सम्मानित जीवन्ती देवी खोयाल ने बताया दो माह तक चलने वाले पौराणिक जागरों के माध्यम से हरि के द्वार हरिद्वार से लेकर चौखम्बा हिमालय तक विराजमान सभी देवी – देवताओं का आवाहन कर विश्व समृद्धि व क्षेत्र के खुशहाली की कामना की जाती है तथा मदमहेश्वर घाटी का वातावरण भक्तिमय बना रहता है! ज्येष्ठ प्रमुख राकेश नेगी ने बताया कि मदमहेश्वर घाटी के रासी गाँव मे ही पौराणिक जागरों के गायन की परम्परा जीवित है इसलिए प्रदेश सरकार व संस्कृति विभाग को पौराणिक जागरों के गायन की परम्परा को जीवित रखने के लिए विशेष पहल करनी चाहिए।

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