सम्पादक रुद्रप्रयागः लक्ष्मण सिंह नेगी
(नया अध्याय, देहरादून)



ऊखीमठः प्रकृति की सुरम्य वादियों व सीढ़ीनुमा खेत – खलिहानों के मध्य विराजमान पर्यटन गांव सारी में ग्वाल देवता (ग्वाल बालों के देवता) की पूजा विधि – विधान से संपन्न हुई तथा नौनिहालों व ग्रामीणों में भारी उत्साह देखने को मिला। सदियों से चली आ रही परंपरा, रीति रिवाज के अनुसार ग्वाल देवता को दूध, दही, घी, मक्खन व अनेक प्रकार के व्यंजनों का भोग अर्पित किया जाता है। दशकों से चली आ रही परम्परा के अनुसार बच्चे, युवक, युवतियों ने अपने- अपने घर से भोग सामग्री लाकर मंदिर में देवता का लेप किया और सभी के घरों में खूब पशुधन, दूध, दही, घी के भंडार व विश्व समृद्धि की मन्नतें मांगी।
पूजा को लेकर बच्चों में बड़ा उत्साह दिखाई दिया। मंदिर परिसर में अपने-अपने घर से लाकर दूध, दही, घी, मक्खन, रोट आदि खाद्य सामग्री प्रसाद के रूप में सभी ने आपस में वितरित कर ग्रहण किया। इस पूजा की खास बात यह है कि जिन परिवारों के घरों में दूध, दही, घी, मक्खन उपलब्ध नहीं रहता है उन परिवारों को भी पूजा में शामिल होने के लिए उनके पड़ोसी पूजा से पहले उनके घर पर दूध, दही, घी, मक्खन पहुंचा देते हैं, तब वह परिवार भी पूजा में शामिल होते हैं। पूजा के दिन से गांव के चारागाह का कुछ क्षेत्र पशुओं के चरान-चुगान व घास काटने के लिए प्रतिबंधित कर दिया जाता है। ठीक दीपावली के शुभ अवसर पर इस प्रतिबंधित क्षेत्र को पशुओं के चरान-चुगान के लिए खोल दिया जाता है।
पुजारी चैत सिंह भटृ ने कहा कि यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। गांव में सभी सार्वजनिक कार्यक्रम आपसी सहयोग एवं संपूर्ण भागीदारी के साथ संपन्न होते हैं। प्रधान अनीता देवी ने बताया कि ग्वाल देवता पूजन के दौरान ग्रामीणों व नौनिहालों में आपसी सौहार्द बना रहता है। क्षेत्र पंचायत सदस्य भरत सिंह नेगी ने बताया कि पर्यटक गांव सारी में ग्वाल देवता पूजन की परम्परा युगों पूर्व की है। सरपंच देवेंद्र सिंह नेगी ने कहा कि पूजा कार्यक्रम के समय खासकर बच्चों में एक उत्सव का माहौल रहता है। इस तरह के आयोजन हमारी संस्कृति विरासत को जीवित रखते हैं। कहा कि हर साल श्रावण मास में तय तिथि पर ग्वाल देवता की पूजा अर्चना होती है, ताकि बच्चे अधिक से अधिक इस पूजा में शामिल हो सकें। इस मौके पर बच्चे, युवक, युवतिया व धियाणियां मौजूद रही ।







