Punam Bhatnagar
Taminat complex, Bousher
Muscat, Oman
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
मैं अदृश्य होना चाहती हूँ
उफ, थक गई हूँ मैं। दिन भर घर का और बाहर का काम करके।
कोई भी मुझे जरा-सा भी नहीं समझता। हर किसी को अपनी ही मर्जी चाहिए। मेरा क्या? मेरे बारे में कोई भी नहीं सोचता। सबको बस अपनी ही पड़ी है। आज तो हद ही हो गई।
मैं अपनी बेटी को किसी बात पर डाँट रही थी कि उसकी दादी ने मेरी ऐसी क्लास ली कि मन किया, बस अब मैं कहीं चली जाऊँ। फिर क्या था, आज तो बस यही सोचा कि बहुत हो गया। अब मैं कहीं चली जाती हूँ और कभी वापस नहीं आती।
रोज यही सब सोचते-सोचते मैं सो जाती थी, लेकिन कभी-कभी लगता है कि भगवान मुझे बस एक दिन के लिए गायब कर दें। फिर मैं देखूँ कि मेरे बिना इनका काम कैसे चलता है।
उस दिन मैं सिर्फ अपने मन का करूँगी। खूब चाय पीऊँगी, खूब गाने सुनूँगी, और जो कहानियों की किताबें मैंने मँगाई हैं, जिन्हें पढ़ने का मुझे कभी समय ही नहीं मिला, उन्हें पढ़ूँगी। मैं देखना चाहती हूँ कि मेरे बिना इन्हें कितना मज़ा आता है, या फिर ये दिन भर मुझे याद करते हैं।
अगर समय मिला, तो मैं अपने माता-पिता के घर भी जाकर देखूँगी कि वे क्या कर रहे हैं। उन्होंने आज क्या बनाया, क्या खाया, या फिर रात का बचा हुआ खाना ही खाया। और भी बहुत कुछ देखना चाहती हूँ।
लेकिन लगता है, एक दिन बहुत कम है। भगवान मुझे कुछ और दिनों के लिए गायब कर दें, ताकि मैं अपने मम्मी-पापा को भी देख सकूँ। वे बहुत अकेले हैं। उनकी बहुत याद आती है। पता नहीं वे मेरे बिना कैसे रहते हैं। वे बहुत अकेले हैं, लेकिन कभी कुछ नहीं कहते।






