राजकुमार कुम्भज, इन्दौर
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
दिल्ली दृश्य
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गाली की चर्चा नाली तक आ गई है। थोड़ा इंतजार कीजिए, ताली बजाते हुए ये सब कुछ जल्द ही थाली तक भी आ सकता है, (संदर्भ, कँगना रनौत, सांसद )
Cjp प्रायोजित छात्र-छात्राओं के रोषपूर्ण आंदोलन में कतिपय तत्वों द्वारा, जो और जैसा बेशर्म, बेहूदा और बदचलनीभरा प्रदर्शन प्रस्तुत किया गया, उसका कोई भी और कैसा भी प्रतिकार हमेशा कमतर ही कहा जाएगा, लेकिन सांसद?
आंदोलनकारियों ने नितांत अनावश्यक और नितांत अमर्यादित भाषा-व्यवहार को सहजतापूर्वक अपनाया; क्योंकि किसी भी प्रदर्शन में लेशमात्र भी लिहाज का नहीं होना, उच्छृंखलता ही कहा जाएगा।
उन्मुक्त हो चली पीढ़ी के नये संस्कार, क्या अपने परिवार तथा परिजनों से इस हद तक त्रस्तता-आग्रही हो गये हैं कि वे समस्त सामाजिकता से विमुख हो जाने पर उतर आए हैं?
ये प्रश्न अपने आप से भी पूछा जा सकता है कि क्यों और कैसे आजकल के बच्चे बेकाबू व अवज्ञाकारी हो जाने को उतावली में उत्तर आधुनिकता स्वीकार करने पर उतारू हो गए हैं?
क्यों वे निर्भयतापूर्वक ग्रे-शेड की जीवन-शैली आकस्मिकतौर से स्वीकार कर रहे हैं? क्यों उन्हें नये कपड़े फाड़कर अथवा फड़वाकर पहनना आकर्षित कर रहा है?
नहीं, ये हैप्पी से ऊबे हिप्पी नहीं हैं, अभी इन्होंने संपूर्ण संपन्नता जैसी भद्दी-विलासिता देखी ही कहाँ है? फिर ऐसा क्यों है कि ये युवजन वर्तमान से असंतुष्ट हैं, नाराज हैं और इतने गुस्सैल स्वभाव में आ गए हैं कि मौजदा सिंहासन को चुनौती देने पर आमादा हो गये हैं?
सवाल ये भी है कि क्यों और कैसे परिवार और समाज, अपनी सामान्य समस्याओं के समाधान हेतु, बाहरी-संस्थाओं की सेवाएँ क्रय करने से संतुष्ट हो रहने का स्वाँग रचने में सम्मान महसूस कर रहा है?
संसद अपने परम्परागत तरीके से स्वीकार-अस्वीकार के प्रहसन में सभीका यथायोग्य सम्मान करते हुए सभी कुछ तथाकथित सम्मानपूर्वक समेटने में संलग्न है।
कहीं ऐसा तो नहीं है कि दुर्लभ हो चले असंभव का संभव पाने का आग्रह, दुराग्रह और सत्याग्रह के उपकरण, आंदोलन के लिए हार्दिक शुभकामनाओं सहित अब कोई नयी जमीन तलाश रहे हैं?
क्या ये विश्वास, इस विश्वास के साथ बचा रहेगा कि आन्दोलन कभी मरते नहीं हैं, लेकिन अपने स्वनिर्मित प्रोटोकॉल के साथ?






