संजय सोंधी
(संयुक्त निदेशक)
शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
जीवन की असली मंजिल: पद नहीं, आंतरिक शांति
बचपन के गलियारों में घूमते हुए अक्सर हमारी आंखें बड़ों की दुनिया की ओर कौतुक और लालसा से उठती थीं। हमें लगता था कि बड़े होना, अपने पैरों पर खड़े होना और कोई मुकाम हासिल कर लेना ही जीवन के तमाम संशयों और बंधनों का अंतिम समाधान है। उस मासूम उम्र में भी प्रतियोगिता का दबाव कम नहीं था—कक्षा में प्रथम आने की होड़, दूसरों से बेहतर साबित होने का तनाव और निरंतर आगे बढ़ते रहने की एक अंतहीन ललक। मन को हमेशा यही दिलासा दी जाती थी कि यह दौड़ बस कुछ वर्षों की है, एक बार कोई अच्छा पद, मान-प्रतिष्ठा या आर्थिक संबल मिल जाए, तो जीवन शांति और सार्थकता के एक सुखद महासागर में प्रविष्ट हो जाएगा। आज जीवन के पांचवें दशक के मुहाने पर खड़े होकर जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं, तो वह पूरा विचार ही एक छलावा सा प्रतीत होता है। पचास वर्ष की उम्र जीवन का वह पड़ाव है जहां सफलता के अधिकांश पैमाने हासिल किए जा चुके होते हैं, सामाजिक प्रतिष्ठा और करियर का शिखर भी मिल चुका होता है, लेकिन फिर भी मन के किसी गहरे कोने में एक अजीब सी अतृप्ति, एक अनबूझा असंतोष और शून्य छाया रहता है। मन बार-बार यही प्रश्न पूछता है कि क्या वाकई यह वही मंजिल थी जिसके लिए हमने अपने जीवन के सबसे सुनहरे वर्ष दौड़ते-भागते निछावर कर दिए?
मानव मन की इस विडंबना को समझने के लिए यदि हम आधुनिक मनोविज्ञान और दर्शन का सहारा लें, तो इसे ‘हेडोनिक ट्रेडमिल’ (Hedonic Treadmill) या सुखवादी ट्रेडमिल का सिद्धांत कहा जाता है। मनोवैज्ञानिक एड डिनर द्वारा प्रतिपादित यह सिद्धांत बताता है कि इंसान अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति के बाद कुछ समय के लिए सुख या संतुष्टि का अनुभव तो करता है, लेकिन बहुत जल्द उसका मन उस उपलब्धि को सामान्य मान लेता है और वापस अपनी पुरानी असंतोष की स्थिति में आ जाता है। ठीक उसी ट्रेडमिल की तरह जिस पर व्यक्ति लगातार दौड़ता तो रहता है, पर पहुंचता कहीं नहीं। पचास की उम्र में पहुंचकर यह अहसास और अधिक गहरा हो जाता है क्योंकि अब भविष्य के भ्रम समाप्त होने लगते हैं। इंसान को समझ आने लगता है कि जिन भौतिक सफलताओं और पदों को उसने अपनी खुशी का अंतिम पड़ाव माना था, वे केवल बाहरी आवरण थे। दुनिया के महान दार्शनिकों ने भी इस आंतरिक असंतोष को रेखांकित किया है। जर्मन दार्शनिक आर्थर शोपेनहावर ने कहा था कि जीवन इच्छा और तृप्ति के बीच झूलता हुआ एक लोलक (पेंडुलम) है—जब इच्छा पूरी नहीं होती तो दुख होता है, और जब पूरी हो जाती है तो ऊब और असंतोष घेर लेता है।
इस असमंजस और मानसिक तनाव का मूल कारण हमारी वह सामाजिक परवरिश है जो हमें केवल ‘पाने’ और ‘बनने’ की अंधी दौड़ में धकेलती है, ‘होने’ और ‘जीने’ का पाठ नहीं पढ़ाती। हम बचपन से ही अपने अस्तित्व का मूल्य दूसरों की तुलना में आंकने के आदी हो जाते हैं। विद्यालय के रिपोर्ट कार्ड से शुरू हुई यह प्रतिस्पर्धा कॉरपोरेट या प्रशासनिक सीढ़ियां चढ़ने तक जारी रहती है। जब कोई व्यक्ति अपनी जीवन-यात्रा के उत्तरार्ध में पहुंचता है, तो उसे अहसास होता है कि उसने जिस गंतव्य को अपनी मंजिल समझा था, वह तो किसी और के द्वारा तय किया गया एक सामाजिक ढांचा था। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा किया गया ‘गैलेप स्टडी ऑन एडल्ट डेवलपमेंट’ (जो मानव जीवन पर हुआ सबसे लंबा अध्ययन है) स्पष्ट रूप से यह निष्कर्ष निकालता है कि मनुष्य की वास्तविक संतुष्टि और मानसिक शांति का संबंध उसकी संपत्ति, पद या सामाजिक हैसियत से नहीं, बल्कि उसके आंतरिक संबंधों और आत्म-बोध से होता है।
50 वर्ष की आयु में मन में उठने वाला यह असंतोष वास्तव में कोई नकारात्मक बीमारी नहीं, बल्कि चेतना की एक चेतावनी है। यह इस बात का संकेत है कि अब तक हमने जीवन को केवल बाहर की ओर जिया है, अंदर की ओर मुड़कर नहीं देखा। जब बाहरी दुनिया के सारे खिलौने—चाहे वह पद हो, शक्ति हो या धन—पुराने और अर्थहीन लगने लगते हैं, तब मन एक गहरे शून्य का अनुभव करता है। यह असंतोष दरअसल इस बात की स्वीकारोक्ति है कि भौतिक उपलब्धियां आत्मा की भूख को शांत नहीं कर सकतीं। जीवन की अंतिम मंजिल कोई बाहरी स्थान या पद नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर की शांति और स्वीकृति है। जब तक मनुष्य इस सत्य को स्वीकार नहीं करता और अपनी आकांक्षाओं की अंधी दौड़ को विराम देकर आंतरिक संतुलन की खोज नहीं करता, तब तक मन का यह असमंजस और असंतोष यूं ही बना रहेगा।






