राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
विशिष्ट -आदमी
(लघु कथा)
सोमदत्त अपने नगर का सबसे रूपवान और वाकपटु युवक था। उसके पास महंगे वस्त्र थे, बात करने का आधुनिक ढंग था और उसकी भाषा अत्यंत प्रभावशली थी। वह जहाँ भी जाता, लोग उसकी बाहरी चमक देखकर आकर्षित हो जाते। सोमदत्त को लगता था कि उसका व्यक्तित्व संपूर्ण और सर्वश्रेष्ठ है।
एक दिन नगर के राजा ने राज्य के सबसे योग्य और संपूर्ण व्यक्तित्व वाले व्यक्ति को प्रधानमंत्री का सलाहकार नियुक्त करने की घोषणा की। सोमदत्त अपनी योग्यता को लेकर पूरी तरह आश्वस्त था। वह पूरे ठाट-बाठ के साथ राजदरबार पहुंचा।
राजा के सामने परीक्षा शुरू हुई। पहले चरण में सोमदत्त ने अपनी वाकपटुता से सबको प्रभावित कर लिया। लेकिन दूसरे चरण में राजा ने एक कठिन परिस्थिति सामने रखी—“यदि पड़ोसी राज्य अचानक आक्रमण कर दे और प्रजा में हाहाकार मच जाए, तो आप एक नागरिक के रूप में क्या करेंगे?”
सोमदत्त ने अपनी वाणी के जादू से बड़े-बड़े शब्द कहे, लेकिन उन शब्दों में कोई ठोस योजना, धैर्य या सहानुभूति नहीं थी। जब एक दरबारी ने उससे प्रति-प्रश्न किया, तो सोमदत्त अपना आपा खो बैठा। वह क्रोध में चिल्लाने लगा। उसकी वाणी की मधुरता गायब हो गई और अहंकार साफ दिखने लगा।
राजा ने मुस्कुराते हुए कहा, “सोमदत्त, तुम्हारा बाहरी आवरण सुंदर है, तुम्हारी भाषा पर पकड़ है, लेकिन तुम्हारा आंतरिक व्यक्तित्व अभी शून्य है। संकट में जो धैर्य खो दे और अहंकार को आगे लाए, उसका व्यक्तित्व संपूर्ण नहीं हो सकता।”
अपमानित और दुखी सोमदत्त नगर से दूर जंगलों में रहने वाले एक आत्मज्ञानी संत स्वामी गौतम बुद्ध की कुटिया पर पहुंचा। उसने रोते हुए अपने भीतर के खालीपन को स्वीकार किया और पूछा, “हे तथागत! संपूर्ण व्यक्तित्व कैसे विकसित होता है? मुझमें क्या कमी है?”
तथागत ने सोमदत्त को ध्यान से देखा और कुटिया के बाहर लगे एक आम के पेड़ की ओर इशारा करते हुए कहा, “इस पेड़ को देखो। इसमें फल तब आते हैं, जब इसकी जड़ें जमीन में गहरी होती हैं, तना मजबूत होता है, और यह धूप-आंधी को चुपचाप सहता है। व्यक्तित्व भी ऐसा ही है। कल सुबह से तुम मेरी कुटिया में रहकर चार स्तंभों पर काम करोगे।”
बुद्ध ने संपूर्ण व्यक्तित्व के विकास के लिए सोमदत्त को चार सूत्र दिए पहला शारीरिक विकास करें। सोमदत्त को सादा भोजन, नियमित योग और श्रम करने को कहा। इससे सोमदत्त का शरीर केवल सुंदर ही नहीं, बल्कि भीतर से शक्तिशाली और ऊर्जावान बना।
मानसिक और बौद्धिक विकास सोमदत्त को रोज़ाना शास्त्रों का अध्ययन करना पड़ता उसे गंभीर विषयों पर तर्क-वितर्क करना और समस्याओं के शांत हल खोजना सिखाया गया। इससे उसके भीतर वैचारिक गहराई आई।
भावनात्मक संतुलन बुद्ध ने सोमदत्त को सेवा कार्य में लगाया। वह बीमारों की सेवा करता, गरीबों के दुख सुनता। धीरे-धीरे सोमदत्त के भीतर से ‘मैं’ (अहंकार) समाप्त होने लगा और उसकी जगह करुणा, सहानुभूति और सहनशीलता ने ले ली। उसने विपरीत परिस्थितियों में भी शांत रहना सीख लिया।
आत्मिक जागृति रोज शाम को सोमदत्त घंटों ध्यान (साधना) में बैठता। ध्यान ने उसे अपने भीतर झांकना सिखाया। वह जान गया कि असली शक्ति बाहर की प्रशंसा में नहीं, बल्कि भीतर के संतोष में है।
तीन वर्ष बीत गए सोमदत्त अब पूरी तरह बदल चुका था। उसके चेहरे पर अब केवल बनावटी चमक नहीं, बल्कि एक दिव्य तेज था। उसकी वाणी में अहंकार की जगह विनम्रता और ठहराव था।
तभी एक दिन उस राज्य पर सचमुच संकट आ गया। पड़ोसी राज्य के सैनिकों ने सीमा पर हमला कर दिया और राज्य के कई गांवों में अराजकता फैल गई। लोग डरकर भागने लगे।
सोमदत्त ने जब यह सुना, तो वह चुप नहीं बैठा। वह तुरंत प्रभावित गांवों में पहुंचा। उसने अपनी शारीरिक शक्ति से घायलों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया। अपनी बौद्धिक क्षमता से ग्रामीणों को संगठित करके सुरक्षा की योजना बनाई। अपने भावनात्मक संतुलन के कारण उसने डरती हुई प्रजा को ढांढस बंधाया और उनमें साहस फूंका।
जब राजा को इस युवक के चमत्कारी कार्यों का पता चला तो वे स्वयं उससे मिलने पहुंचे। राजा ने सोमदत्त को पहचान लिया।
राजा ने गद्गद होकर कहा, “सोमदत्त! तीन वर्ष पहले तुम्हारे पास केवल शब्द थे, आज तुम्हारे पास चरित्र है। तब तुम्हारे पास केवल रूप था, आज तुम्हारे पास स्वरूप है। आज तुम्हारा व्यक्तित्व संपूर्ण है क्योंकि इसमें शरीर की शक्ति, बुद्धि की तीक्ष्णता, हृदय की करुणा और आत्मा का बल एक साथ समाहित है।”
सोमदत्त ने झुककर राजा का अभिवादन किया और कहा, “महाराज, संपूर्ण व्यक्तित्व बाहर से नहीं सजता, वह भीतर के आत्म-रूपांतरण से विकसित होता है।”
आज की युवा पीढ़ी का संपूर्ण व्यक्तित्व केवल अच्छे कपड़े पहनने या अच्छा बोलने से नहीं बनता। यह चार स्तरों पर निरंतर काम करने से विकसित होता है स्वस्थ शरीर, प्रखर बुद्धि, स्थिर एवं करुणामयी मन, और जागरूक आत्मा। जब ये चारों मिल जाते हैं, तब एक साधारण मनुष्य ‘विशिष्ट -आदमी’ बन जाता है।






