सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री / लेखिका / शिक्षिका / रिपोर्टर / उद्घोषिका
नवापारा-राजिम, रायपुर (छत्तीसगढ़)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
(उपन्यासकार प्रेमचंद जयंती विशेष)
आलेख
———-
“प्रेमचंद जिन्होंने मनुज की पीड़ा को साहित्य की आवाज बनाया” – सुश्री सरोज कंसारी
========================
यदि भारतीय हिंदी साहित्य समाज का दर्पण है, तो मुंशी प्रेमचंद उस दर्पण को सबसे स्वच्छ रखने वाले कारीगर थे। एक सामाजिक चिंतक और सुधारवादी चेतना के रचनाकार के रूप में, 31 जुलाई 1880 को एक छोटे से गाँव लमही में जन्मे धनपत राय श्रीवास्तव ने अपनी कलम से भारत के गाँवों, खेतों और झोपड़ियों को साहित्य के सिंहासन पर बैठाया। उन्होंने राजाओं की नहीं, बल्कि शोषितों, कृषकों, मजदूरों और विवश महिलाओं की कहानियाँ लिखीं। आज उनकी जयंती पर हम केवल एक उपन्यासकार अथवा कहानीकार को नहीं, बल्कि उस असीम संवेदनशील इंसान को याद करते हैं, जिन्होंने अपनी मिट्टी की सोंधी खुशबू को रचनाओं में सजाया और जिसने गरीब की आँख का आँसू कागज़ पर उतार दिया। प्रेमचंद आज भी इसलिए प्रासंगिक हैं क्योंकि उनके पात्र आज भी हमारे बीच मौजूद हैं।
उपन्यासकार प्रेमचंद जी अध्यापन कार्य के साथ-साथ ‘हंस’ पत्रिका का संपादन भी किया करते थे। उनका वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था, प्रेमचंद नहीं। वह न तो कोई सरकारी मुंशी थे और न ही ‘मुंशी’ उनकी जाति थी, फिर भी पूरा हिंदुस्तान उन्हें “मुंशी प्रेमचंद” के नाम से जानता है। इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं। पहला कारण उनकी नौकरी है। प्रेमचंद जी ने अपने करियर की शुरुआत में स्कूल में अध्यापक और बाद में डिप्टी इंस्पेक्टर के रूप में कार्य किया था। उस दौर में पढ़े-लिखे सरकारी कर्मचारियों या बाबुओं को लोग आदरपूर्वक “मुंशी जी” कहकर पुकारते थे। दूसरा कारण उर्दू साहित्य (अदब) की परंपरा है। प्रेमचंद जी शुरुआत में उर्दू में “नवाब राय” के नाम से लिखा करते थे। हालांकि वह आधिकारिक रूप से मुंशी नहीं थे, पर उनकी लेखनी में एक अनोखा चमत्कार था कि पूरा देश सम्मानपूर्वक उन्हें “मुंशी” कहकर पुकारने लग गया था।
31 जुलाई 1880 को वाराणसी के निकट लमही गाँव में जन्मे धनपत राय (प्रेमचंद) का बचपन अत्यधिक गरीबी में बीता। 8 वर्ष की आयु में माता और 15 वर्ष की अल्पायु में पिता का साया सिर से उठ जाने के कारण वे अनाथ हो गए, जिसके बाद उन्होंने ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई पूरी की। वर्ष 1921 में महात्मा गांधी के आह्वान पर उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और “हंस” पत्रिका के संपादन में जुट गए। प्रेमचंद ने अपने जीवन में तीन सौ से अधिक कहानियाँ और 14 उपन्यास लिखे। उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में “गोदान” किसान होरी की गाय पालने की इच्छा की कहानी है, तो “कफन” गरीबी की चरम सीमा को दर्शाती है। “पूस की रात” में किसान की बेबसी, “निर्मला” में दहेज प्रथा का दर्द और “ठाकुर का कुआँ” में छुआछूत की क्रूर सच्चाई छिपी है, जबकि गबन और ईदगाह भी उनकी महान व अतिशय संवेदनायुक्त कृतियाँ हैं।

एक समाज-सुधारक के रूप में प्रेमचंद ने किसान, नारी, दलित और भ्रष्टाचार पर अपने प्रखर विचार रखे। प्रेमचंद केवल लेखक नहीं, बल्कि समाज के एक ऐसे चिन्तक थे जो उसकी दशा में परिवर्तन लाने के लिए अथक प्रयास करते रहे थे। आज 2026 में भी उनके उठाए मुद्दे पूरी तरह जिंदा हैं; आज भी किसान कर्ज में डूब रहा है और समाज में दहेज लिया जा रहा है। इसलिए जब तक भारत में गरीबी और विसंगतियाँ हैं, तब तक प्रेमचंद प्रासंगिक रहेंगे। हमारे हिन्दी साहित्य के सबसे बड़े माने जाने वाले लेखक प्रेमचंद ने 8 अक्टूबर 1936 को इस भीषण और असंवेदनशीलता से भरे संसार को अलविदा कहा, पर उनकी कलम आज भी जीवित है। एक साहित्यकार का लक्ष्य हमेशा से समाज को संवेदनशील और जागरूक बनाना रहा है, रहा था और हमेशा रहेगा।
———————————————–






