भारती चौधरी
(रिसर्च स्कॉलर)
जौनपु, उत्तर प्रदेश
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
भोजपुरी में सस्ती लोकप्रियता एवं फूहड़ गीतों का दौर।
लगभग 7 वीं सदी से प्रारंभ माने जाने वाली बोली भोजपुरी एक मधुर और मीठी बोली के रूप में जानी जाती है।
बिहारी हिन्दी उपवर्ग की सर्वाधिक महत्वपूर्ण बोली भोजपुरी है, एवं लोकप्रचलन की दृष्टि से भी हिन्दी की सबसे बड़ी बोली है।
भोजपुरी न सिर्फ उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड में बोली जाती है, बल्कि मॉरिशस एवं फिजी आदि देशों में भी बोली जाती है। भोजपुरी एक समृद्ध संस्कृति और परंपरा की पहचान की पहचान है।
संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होने के लिए भोजपुरी अभी भी संघर्षरत है।
बीसवीं शताब्दी से लेकर इक्कीसवीं शताब्दी के प्रारंभ होने तक भोजपुरी गीतों में मधुरता एवं उचित शब्दों का प्रयोग बना रहा जिससे रिश्तों के साथ साथ समाज में भी अपने गॉंव की मिट्टी की सौंधी खुशबू बिखेरती रही।
परिवार, समाज में भोजपुरी गीतों को सुनकर शर्मसार नहीं होना पड़ता था, हालांकि अपवाद हर दौर में होते हैं।
इक्कीसवीं सदी में प्रारंभ के कुछ समय बाद भोजपुरी गीतों का काफिला शहरों तक पहुंच गया है । शहरों तक पहुँचना भोजपुरी की लोकप्रियता तो है ही, किन्तु अब भोजपुरी में मधुर संगीत और शब्दों की मिठास नहीं, बल्कि फूहड़ शब्दों एवं अश्लीलता का दौर ही चल पड़ा है।
ये फूहड़ गीत समाज, युवा पीढ़ी एवं आने वाली पीढ़ी की मानसिकता किस हद तक खराब कर रही है और आगे करेगी इसका अंदाजा इस समाज और इन गीतों को लिखने तथा गाने वाले कलाकारों को शायद नहीं है, और अगर है भी तो लोकप्रियता के लालचवश समूचे समाज को इसका भुगतान करना पड़ सकता है।
कहा जाता है कि- “संगीत, साहित्य और भाषा समाज की प्रगति एवं विकास का पर्याय ही है, जैसे जैसे समाज आगे बढ़ेगा इनका विकास स्वयं ही होता रहेगा।
किंतु इन फूहड़ और अश्लील गीतों से भोजपुरी बोली का स्तर दिन पे दिन गिरता दिखाई दे रहा है।
भोजपुरी गाने न सिर्फ समाज, बल्कि कुछ रिश्तों की गरिमा को भी चोट पहुँचा रहे हैं।
भाभी जिसे माँ का दर्जा दिया जाता है इस रिश्ते पर भी भोजपुरी में अश्लील गाने बनाकर रिश्तों को शर्मसार करने का कार्य किया जा रहा है।
इन भोजपुरी गीतों से लेखक, गायक एवं कलाकार बहुत लोकप्रियता हासिल कर लिये हैं।
शायद इन्हें समाज में फैल रही गन्दी मानसिकता से कोई लेना-देना नहीं है साथ ही हमारे समाज को भी बलात्कार जैसी घटनाएं अब बहुत परेशान नहीं करती हैं, और अगर समाज को फर्क पड़ता तो यही भोजपुरी गाने को फूहड़, अश्लील शब्दों से भरने वाले कलाकारों को राजनीति, समाजसेवा और विश्वविद्यालयों तक पहुँचने ही नहीं देती। किसी बलात्कार जैसी घटना पर हफ्ते भर हाथ में मोमबत्तियां लेकर घूमने वाला यह समाज गीत, संगीत के माध्यम से फैल रही फूहड़पन एवं अश्लीलता को मौन सहमति दे देता है।
आज के दौर में स्त्री को भिन्न – भिन्न वस्तु की उपमा देना एवं देह प्रदर्शन करवाया जाना समाज के गिरते स्तर की ओर संकेत करता है। गीत, संगीत और सिनेमा में परोसे जा रहे इस धीमें जहर से अनगिनत मनुष्यों की मानसिकता प्रभावित हो रही है, अतः यह अदृश्य भी नहीं है।







