सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री/लेखिका/शिक्षिका
रिपोर्टर/उद्घोषिका, नवापारा-राजिम,
रायपुर, (छत्तीसगढ़)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
लेख:
”मन का संतोष ही दुखों का पूर्ण अंत है!”
: सुश्री सरोज कंसारी
”हमारा सुख बाहरी परिस्थितियों में नहीं, बल्कि भीतर के धैर्य, संतोष में है।”
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यदि विचार किया जाए, तो चिंता के स्थान पर चिंतन करने से यह स्पष्ट होता है कि आज मनुष्य के पास सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं है। उसके पास सब कुछ उपलब्ध है। फिर भी मनुष्य के भीतर यह बेचैनी क्यों पनप जाती है? मनुष्य जब भी जीवन को समझने का प्रयास करता है, वह अचानक व्याकुल हो जाता है—न रात को नींद आती है और न दिन में चैन मिलता है। इसका कारण बाहरी साधनों की कमी नहीं, बल्कि आंतरिक संतोष का अभाव है। जब तक मन में “और पाने” की लालसा की अग्नि सुलगती रहेगी, तब तक कोई भी बड़ी से बड़ी उपलब्धि दुखों का अंत नहीं कर सकती। सत्य तो यह है कि मन का संतोष ही हमारे समस्त दुखों का पूर्ण अंत है।
प्रेरणादायक काव्य:
”हे मनुज!
तू धैर्य, संतोष,
रखकर तो देख,
कोई दुःख, पीड़ा,
व्याकुलता तुझे छू नहीं सकेगी।”
वास्तव में देखा जाए तो दुखों का अनुभव हमें कभी बाहर से नहीं होता, वे हमारे मन के भीतर ही जन्म लेते हैं। यदि गहराई से समझें, तो दुख की शुरुआत तब होती है जब हम “जो हमारे पास है” उसकी तुलना “जो दूसरों के पास है” से करने लगते हैं। जब इच्छाओं का अंत हो जाता है, तो दुखों की समाप्ति स्वतः ही हो जाती है। हर अधूरी इच्छा मन में एक कांटे की तरह चुभती रहती है, जिससे हमारा चैन छिन जाता है। इसलिए स्वयं को समझें, जितना हो सके खुद का ध्यान रखें। संतोष और सब्र जैसी भावनाएं सदैव हमारे भीतर बनी रहनी चाहिए। हमारा सुख और हमारी शांति बाहरी परिस्थितियों में नहीं, बल्कि हमारे भीतर के धैर्य और संतोष में छिपे होते हैं। बस, हमें यह ध्यान रखना है कि हमारे भीतर कितना संतोष है।
हमारे अंतर्मन का संतोष बाजार से खरीदी जाने वाली कोई चीज बिल्कुल नहीं है, जिसे हम पैसों से पा सकें। यह तो हमारे एक-एक दिन के छोटे-छोटे अभ्यासों से उपजता है। यदि हम रोज रात को सोने से पहले उन तीन चीजों को याद करें जिनके लिए हम ईश्वर का धन्यवाद कर सकते हैं, तो मन अपने आप हल्का हो जाता है। यदि हम अपनी हर इच्छा के पीछे यह प्रश्न रखें कि “क्या यह सच में मेरी आवश्यकता है या केवल हृदय की अभिलाषा?”, तो आधी उलझने यहीं खत्म हो जाएंगी। और सबसे जरूरी, यदि हम वर्तमान क्षण में पूरी तरह जीना सीख लें, तो अतीत का पछतावा और भविष्य की चिंता दोनों अपने आप मिट जाएंगी। यही संतोष की सीढ़ियाँ हैं, जो हमें शांति तक ले जाती हैं।
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