सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री/लेखिका/शिक्षिका
रिपोर्टर/उद्घोषिका, नवापारा-राजिम,
रायपुर, (छत्तीसगढ़)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
आलेख: संत-कवि तुलसीदास विशेष)
तुलसीदास ने अपनी इंद्रियों को नियंत्रण में कर वैराग्य प्राप्त कर लिया।
“सुश्री सरोज कंसारी”
“दया ही आत्म-धर्म, अहंकार ही विकारों की जड़”
”जिनके रोम-रोम में बसे थे राम, महान संत थे गोस्वामी तुलसीदास।”
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काव्य:
”धर्म का मूल सदा ही जग में,
तुलसी ने दया बताया था।
अहंकार मिटाने का,
सबको पाठ पढ़ाया था।
अहंकार को ही सब पापों का,
उद्गम व आधार बताया था।”
यह पावन धरती संत-महात्माओं, ऋषि-मुनियों के त्याग, तपस्या और बलिदान से सिंचित है। जिन्होंने लोक-कल्याण के लिए सदैव सद्मार्ग अपनाया और सुप्त अवस्था को जागृत कर ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के भाव स्थापित करने के लिए सदैव अग्रसर रहे। इतिहास के पन्ने पलटकर देखें तो पता चलेगा कि स्वार्थ से ऊपर उठकर भी अनेक लोग आज भी लोगों के दिलों में जीवित हैं। धर्म-संस्कृति, मर्यादा और संस्कार को जिन्होंने जीवन का ध्येय माना और हर पल नैतिक मूल्यों को धारण किया।
अपने लिए जीना कोई बड़ी बात नहीं, वह तो सुबह और रात सबके लिए होती हैं। कोई इसका भरपूर उपयोग कर हर लम्हे में जीवन में उच्च आदर्श भरता है और दूसरों के जीवन से अंधकार दूर करने के लिए समर्पित हो जाता है। वह अतीत और भविष्य की चिंता नहीं करता। चारों तरफ व्याप्त कुविचारों की चल रही हवा में शांति, सद्भाव और सत्कार्य के अमृतरूपी विचार को घोलने का काम करता है। महान आत्माओं का जीवन सात्विक होता है, सहज और सरल होता है। सद्मार्ग पर चलकर वे दूसरों के लिए मार्ग प्रशस्त करते हैं। उनकी बोली-भाषा व व्यवहार में सादगी होती है, जो समाज के अव्यवस्थित लोगों को संगठित कर धर्म-अध्यात्म, दया-दान, क्षमा और सहयोगपूर्ण कार्य करने के लिए प्रेरित करती है।
ऐसे ही एक महान संत हुए जिन्होंने भक्ति की शक्ति से, लगन से, शुद्ध-पावन हृदय से साक्षात ईश्वर के दर्शन किए। बहुमुखी प्रतिभा के धनी एक ऐसे व्यक्तित्व जिनके मन, वचन और कर्म में सिर्फ भक्ति की गंगा बहती थी। महान लोकनायक संत गोस्वामी तुलसीदास जी का जीवन अद्भुत और चमत्कारिक था। जो बचपन से ही माता-पिता के प्रेम से वंचित रहे, लेकिन उनका जन्म ही राम के गुणगान के लिए हुआ था। ईश्वरीय कृपा थी उन पर, जिन्होंने विश्व समुदाय को अपने ज्ञान से आलोकित किया। प्रचलित रूप से महाकवि तुलसीदास जी का जन्म संवत 1554 की श्रावण शुक्ल सप्तमी को चित्रकूट के राजापुर गाँव में हुआ था। उनके पिता आत्माराम दुबे, माता हुलसी देवी थीं। जन्म के समय बालक तुलसी के पूरे 32 दाँत थे। किसी अनिष्ट की आशंका से पिता ने त्याग कर दिया। उनके मुख से जन्म लेते ही ‘राम’ शब्द निकला था, इसलिए इनका नाम ‘रामबोला’ पड़ा। उनका पालन-पोषण चुनिया नामक दासी ने किया।
संत नरहरिदास ने काशी में ज्ञान एवं भक्ति की शिक्षा दी। उनका विवाह रत्नावली से हुआ, जो सर्वगुण-संपन्न और सुशील थीं। उन्हें पाकर वे ईश्वर-भक्ति से दूर होने लगे और उसी का ध्यान करते, जिसे देख पत्नी चिंतित होने लगी। एक बार रत्नावली अपने मायके चली गईं। उन्हें घर पर न पाकर वे बेचैन हो गए और रात्रि में शव को नाव समझकर और सर्प को रस्सी मानकर उनके घर तक पहुँच गए। तब पत्नी ने उन्हें दुत्कारते हुए कहा, “हाड़-मांस से बने इस देह से आपको इतना प्रेम है, जो एक दिन नष्ट हो जाएगा। मेरे पीछे यहाँ तक आ गए। इतना ही मोह अगर श्रीराम से करते तो भव से पार हो जाते।” उनकी फटकार से वे भक्ति में लीन हो गए और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। तुलसीदास जी ने संवत 1631 में चैत्र मास को ‘रामचरितमानस’ लिखना शुरू किया। जिसे दो साल, सात महीने और छब्बीस दिन में अयोध्या में पूर्ण किया। ‘विनय पत्रिका’, ‘दोहावली’, ‘जानकी मंगल’ और ‘कवितावली’ उनके साहित्यिक कार्य हैं।
संत तुलसीदास जी का एक ही लक्ष्य रहा भगवान श्रीराम के दर्शन पाना। रोम-रोम में राम बस गए। कहते हैं जब मन, वचन और कर्म से सात्विक भाव धारण कर कोई लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अग्रसर होता है, तो ईश्वर के दूत स्वयं मंजिल का पता देने आते हैं। यही बात तुलसीदास जी पर लागू हुई। काशी में रामकथा सुनाते समय उनकी भेंट हनुमान जी से हुई। उन्होंने बताया कि राम के दर्शन चित्रकूट में होंगे। वे चित्रकूट में डेरा डालकर बैठ गए। एक बार मार्ग में दो सुंदर युवक घोड़े पर सवार होकर आए। उन्हें देखते ही वे अपना सुध-बुध खो बैठे और दर्शन से वंचित रह गए। हनुमान जी ने उन्हें बताया कि वे राम और लक्ष्मण थे। फिर बहुत पछतावा हुआ। सांत्वना देते हुए उन्होंने कहा, “कल सुबह राम के दर्शन अवश्य होंगे।” माघ महीने की मौनी अमावस्या को जब वे घाट पर लोगों को चंदन लगा रहे थे, तब बालक रूप में भगवान राम आए और कहने लगे “बाबा, हमें चंदन नहीं दोगे!” तब हनुमान जी ने तोते के रूप में याद दिलाने के लिए कहा,
“चित्रकूट के घाट पर, भई संतन की भीर।
तुलसीदास चंदन घिसे, तिलक देत रघुबीर।”
उन्हें देख वे भाव-विभोर हो गए और अश्रुओं की धारा बहने लगी। तब भगवान ने स्वयं तुलसीदास का हाथ पकड़कर तिलक लगा लिया और उनके माथे पर भी लगाया। भक्त और भगवान का रिश्ता गहरा होता है। भक्ति की जहाँ पवित्र ज्योति जलती है, वहाँ आत्मा का परमात्मा से दर्शन होता है। शुद्ध हृदय से की गई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती। तुलसीदास की भक्ति में असीम शक्ति थी जो हमें संदेश देती है कि सांसारिक मोह में डूबे रहने से इच्छाएँ कभी तृप्त नहीं होतीं। हम भटकते ही रहते हैं भोग-विलास में। भौतिक सुख मात्र क्षणिक होता है, एक समय के बाद समाप्त हो जाता है। कर्तव्य की राह चलते हुए भी जो मन को नियंत्रित कर सत्कार्य में रहते हैं, सत्संग करते हैं, शांत और एकाग्रचित होते हैं, वे मानव से महामानव बनते हैं और श्रेष्ठ कर्म से दूसरों के लिए उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। ‘गोस्वामी’ अर्थात् समस्त मोह से विरक्त हो जाना। तुलसीदास ने अपनी इंद्रियों को नियंत्रण में कर वैराग्य प्राप्त कर लिया, इसलिए उन्हें यह उपाधि मिली। संवत 1680 में श्रावण मास कृष्ण पक्ष की तृतीया को ‘राम-राम’ कहते हुए उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया।







