✍ आशीष कुमार त्रिवेदी
बिहार
(नया अध्याम, उत्तराखण्ड)
30 अगस्त का वो काला दिन, जब तरियानी छपरा में गूंजा था गोलियों का शोर।
आजादी की कहानी केवल बड़े शहरों और चर्चित आंदोलनों की कहानी नहीं है। बिहार के गांव-गांव में भी स्वतंत्रता की लौ जल रही थी। शिवहर का तरियानी छपरा इसी संघर्ष और शहादत की अमर गाथा अपने भीतर समेटे हुए है। भारत छोड़ो आंदोलन की लहर पूरे देश में थी। तरियानी छपरा में स्वतंत्रता सेनानी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आगे की रणनीति बनाने के लिए एकत्र हुए थे। इससे पहले बेलसंड में अंग्रेजों की कोठी और थाने पर हमला, हथियारों की लूट तथा बागमती नदी के माडर पुल को क्षतिग्रस्त कर क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी सत्ता को खुली चुनौती दी थी।
इसी से बौखलाई अंग्रेजी फौज तरियानी छपरा पहुंची। निहत्थे आंदोलनकारियों पर अचानक गोलियां बरसने लगीं। देखते ही देखते सभा स्थल चीख-पुकार और गोलियों की तड़तड़ाहट से गूंज उठा। इस गोलीकांड में 10 स्वतंत्रता सेनानी शहीद हो गए और तीन दर्जन से अधिक लोग घायल हुए।
भारत छोड़ो आंदोलन में अंग्रेजों की बर्बरता का गवाह बना तरियानी छपरा के 10 वीर सपूत नवजद सिंह, भूषण सिंह, जय मंगल सिंह, सुखदेव सिंह, सुंदर राम, बुधन महतो, वशीदास, परसन साह, छडू साह और बलदेव साह जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया। यू घटना अंग्रेजी शासन की क्रूरता की ऐसी तस्वीर थी, जिसकी तुलना जलियांवाला बाग की बर्बरता से की जाती है। फर्क सिर्फ इतना रहा कि जलियांवाला बाग को राष्ट्रीय इतिहास में व्यापक पहचान मिली, जबकि तरियानी छपरा के शहीद आज भी अपेक्षित पहचान और सम्मान की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
स्मारक है, लेकिन इतिहास संरक्षण मांग रहा है
शहीदों की स्मृति में तरियानी छपरा में स्मारक बना है और हर वर्ष 30 अगस्त को श्रद्धांजलि दी जाती है। बावजूद इसके यह ऐतिहासिक स्थल आज भी व्यापक विकास और जीर्णोद्धार की बाट जोह रहा है। यह केवल एक स्मारक नहीं, बल्कि स्वतंत्रता की उस कीमत का प्रतीक है, जो इस धरती के वीरों ने अपने रक्त से चुकाई थी।
30 अगस्त इसलिए सिर्फ एक तारीख नहीं—यह तरियानी छपरा के उन दस अमर शहीदों को याद करने का दिन है, जिनकी शहादत ने आजादी की मशाल को और प्रज्वलित किया। उनकी कुर्बानी को नमन और शहीद की धरती को शत-शत प्रणाम।







