वोट प्रतिशत का गणित बिगाड़ेगा खेल, सपा कहीं फिर ना हो जाए फेल : पंकज सीबी मिश्रा

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प्रभारी सम्पादक जौनपुर:  पंकज सीबी मिश्रा

              (राजनीतिक विश्लेषक) 

 

                (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

 

वोट प्रतिशत का गणित बिगाड़ेगा खेल, सपा कहीं फिर ना हो जाए फेल : पंकज सीबी मिश्रा

 

 

पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का गठबंधन हुआ था तो लोकसभा में इन्होने भाजपा के सीटो का गणित बिगाड़ दिया था। उम्मीदें कांग्रेस की काफी बढ़ गईं थीं पर समाजवादी पार्टी की धोखा देने वाली राजनीति से अनभिज्ञ कांग्रेस को विधानसभा चुनावों में सफलता मिलती नहीं देख उसे दरकिनार कर प्रदेश अध्यक्ष अजय राय पर तीखे हमले कर रहें अखिलेश यादव अभी एक चूक कर रहें। सवर्णों के नाराजगी से भाजपा काफी पिछड़ गई सी लगती तो है । पिछले चुनाव में वोट परसेंटेज दोनों ही गठबंधन का लगभग बराबर रहा, परन्तु लोकसभा में भाजपा की सीटें काफी कम हो गईं, समाजवादी पार्टी और कॉंग्रेस गठबंधन उससे आगे निकल गई, सीटें एनडीए से काफी ज्यादा हो गईं। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी वर्तमान में विपक्ष में हैं, बावजूद इसके उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का प्रभाव काफी घटता हुआ हुआ दिखा है। लोकसभा चुनाव के बाद… यानी सपा के लिए संभावनाएं मजबूत दिखने लगीं थी लेकिन आरक्षण रिफार्म आंदोलन ने सबका गणित बिगाड़ दिया है। सपा समर्थको की माने तो 2027 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को लग रहा है कि सत्ता में वापसी की प्रबल संभावना है। इस संभावना को देखते हुए बसपा के जो 10 फीसदी के लगभग वोटर्स अभी भी एकजुट हैं वह मतदाता किधर जाएंगे यह बड़ा गणित है और आप उसे दरकिनार नहीं कर सकते। 2027 के चुनाव में खास तौर से बसपा यदि इसी तरह से कमजोर मुकाबले में दिखाई देगी तो इसका सीधा फायदा कांग्रेस को होगा। जो फिर भी मुख्य फाइट में नहीं दिखाई पड़ेगी। तो वैसी स्थिति में बसपा के यह 10 फीसदी वोटर्स में से 5 फीसदी वोटर्स क्या समाजवादी पार्टी की सरकार की वापसी की संभावनाओं को देखते हुए एनडीए की ओर पोलराइज होंगे अथवा सपा कैंडिडेट को वोट देने की संभावना बनेगी इनके द्वारा ? इस 10 फीसदी में से सारे के सारे भले ही इधर-उधर ना जाए, परंतु इस बात की आशंका काफी बनती है कि यदि बसपा मुख्य फाइट में नहीं दिखी तो इस 10 फीसदी वोटर्स में से पांच सात फीसदी तक जरूर किसी तरफ छिटक सकते हैं ?

दूसरी तरफ सवर्ण मतदाता अगर चुनावी बूथ तक नहीं जाते तो भाजपा को नुकसान उठाना पड़ सकता है क्यूकी एनडीए गठबंधन के चिराग पासवान और रामदास अठावले के आरक्षण पर बयानबाजी ने भाजपा को मुश्किल में डाल दिया है। इस बार ओमप्रकाश राजभर की सभी सीट निकलने की उम्मीद बढ़ गई है जो एक मात्र एनडीए के लिए अच्छी खबर है और अगर इस बार सुभासपा को भाजपा गठबंधन 30 से 40 सीटे देती है तो वह 25 से अधिक सीटे निकाल के दें सकते है क्यूंकि सवर्ण वोटर खुलकर ओमप्रकाश राजभर का प्रचार बूथ लेवल पर कर रहें। क्या बसपा के पांच सात फीसदी वोटर्स बहुत ही निर्णायक साबित हो सकते हैं 2027 के विधानसभा चुनाव में ? जातिगत मतभेदों को जन्म देने वाली रावन समर्थित आसपा का खाता इस बार भी नहीं खुलेगा क्यूंकि दलित वोटर्स जानते है कि रावन मुश्लिम हिमायती नेता है जो अपने हित, लालच और महत्वकांक्षा को आगे रखकर बाद में भाजपा की गोद में बैठ जायेगा। जातिगत राजनीति में पंचायतें जो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही थीं, अचानक महाशक्तिशाली हो गईं। दरअसल अब सबके हाथ एक सूत्र लग गया है, वह है संगठन की शक्ति। संगठन और भीड़ के सहारे इकट्ठे हो रहे एक समूह को राजनीतिक फायदे देखकर अब सारे जातीय समूह संगठित हो रहे हैं। बहुजन समाज पार्टी ने पहले दो अलग ध्रुवों पर रहने वाले जातीय समूहों को एक मंच पर लाकर सोशल इंजीनियरिंग की और सत्ता प्राप्त की बाद में उसी फार्मूले को भाजपा ने बेहतर तरीके से इस्तेमाल किया और केंद्र में आ गई। छोटे छोटे जातीय समूहों के नेतृत्व को सत्ता में भागीदार बनाकर उन्हें अपने साथ जोड़ा। पांच साल सत्ता का सुख भोगने के बाद जातीय समूहों के नेताओं को ब्लैकमेलिंग करना आ गया। इस ब्लैकमेलिंग को उनके पीछे की भीड़ से ताकत मिलती है। वे ब्लैकमेल करके अपना हित साधते रहे, इससे दूसरे समूहों को भी ऐसा करने की प्रेरणा मिली। अब सब सामाजिक न्याय के नाम पर केवल निजी न्याय करने लगे, संविधान के नाम पर निजी विधान ही माने जाने लगे। 2024 के बाद उपजातियों में भी चेतना आई और वे भी अपने स्वार्थ को हिंदू समाज के हित से अलग देखने लगे। 2024 में उत्तर प्रदेश में…. भाजपा 41.37% वोट शेयर के साथ 33 सीटें, सपा 33.5% वोट शेयर के साथ 37 सीटे, कांग्रेस 9.4% वोट शेयर के साथ 6 सीटे और बसपा 9.3% वोट शेयर के साथ शून्य सीटे निकाली थी। अर्थात सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि एनडीए और इंडि गठबंधन के वोट लगभग बराबर थे—43.69% बनाम 43.52%—लेकिन सपा कांग्रेस को 43 सीट और एनडीए को केवल 36 सीट मिलीं। और उससे भी महत्वपूर्ण है कि सपा ने अकेले ही 37 सीट लेकर भाजपा की 33 सीट से आगे निकल गई। उत्तर प्रदेश में तब भाजपा का वोट आधार सिमटा नहीं था; लेकिन उसके सामने विपक्ष का वोट अधिक प्रभावी ढंग से एकजुट हो गया था। बसपा को 2024 में 9.39% वोट मिले, लेकिन एक भी लोकसभा सीट नहीं मिली। 2019 में बसपा का वोट लगभग 19% था। यानी पांच साल में उसके वोट में करीब 50 प्रतिशत की गिरावट हुई। यह सिर्फ वोट प्रतिशत गिरने की कहानी नहीं है। बसपा के सामाजिक आधार में भी टूटन हुई क्यूंकि बसपा भी परिवारवाद के ढर्रे पर निकल चली थी और मायावती ने भतीजो को गद्दी सौप दी जबकि पुराने अनुभवी कार्यकर्ता देखते रह गए। बसपा का करीब 10% वास्तव में एक जैसा 10% नहीं है। इसे मोटे तौर पर दो हिस्सों में समझना चाहिए।

 

पहला—जाटव वोट जो बसपा का पारंपरिक और सबसे मजबूत आधार रहा है। 2024 में भी 44% जाटव बसपा के साथ रहे। इसलिए यह मान लेना कि बसपा के सिमटते ही उसका पूरा वोट सपा में चला जाएगा, गलत होगा यह वोट रावन ले उड़ेगा। लेकिन ध्यान दीजिए लोकसभा चुनाव और उसके पहले के विधानसभा चुनाव में — 25% जाटव इंडि के साथ गए और 24% एनडीए के साथ। अर्थात जाटव वोट में भी बसपा के बाहर जाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। दूसरा—गैर-जाटव दलित। यहां कहानी बिल्कुल अलग है। 2024 में 56% गैर-जाटव दलित इंडि के साथ चले गए जबकि केवल 15% बसपा के साथ रहे। यहाँ भी भाजपा ने सेंधमारी की और उसको 29% शेयर मिले। यानी बसपा के कमजोर होने की स्थिति में गैर-जाटव दलितों का बड़ा हिस्सा पहले ही इंडि की तरफ झुकने का व्यवहार दिखा चुका है। यही 2027 के लिए सपा और भाजपा की सबसे बड़ी उम्मीद यही है।हालांकि इस वोट प्रतिशत को 2027 की सीटों का पूर्वानुमान नहीं माना जा सकता, क्योंकि विधानसभा चुनाव में स्थानीय उम्मीदवार, उसकी लोकप्रियता वर्तमान विधायक की कार्य प्रणाली और सवर्णों का सरकार के खिलाफ आंदोलन /आगामी लड़ाई में भावना और मतदान का मुद्दा बदल सकता है ।

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