हिंदी दिवस की सार्थकता  ( लेख)

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राजेंद्र रंजन गायकवाड

(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक) 

बिलासपुर, छत्तीसगढ़

 

 

                    (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

 

                    हिंदी दिवस की सार्थकता 

                                  (लेख)

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में देखें तो हर साल 14 सितंबर को “हिंदी दिवस” मनाया जाता है। इसकी शुरुआत 14 सितंबर 1949 को हुई, जब भारत की संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी हिंदी को संघ की राजभाषा (Official Language of the Union) के रूप में स्वीकार किया। यह निर्णय मुंशी-आयंगर फॉर्मूले के तहत हुआ और संविधान के अनुच्छेद 343 में इसे शामिल किया गया। संविधान लागू होने (26 जनवरी 1950) के बाद से 1953 से इस दिन को नियमित रूप से मनाया जाने लगा। यह दिन बेओहर राजेंद्र सिंहा (हिंदी के प्रबल समर्थक) के जन्मदिन से भी जुड़ा है।

 

    मुख्य सार्थकता और उद्देश्य हिंदी का सम्मान और जागरूकता पैदा करना है। यह दिन हिंदी को सिर्फ भाषा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, पहचान और एकता का प्रतीक मानता है। करोड़ों लोगों द्वारा बोली जाने वाली इस भाषा को बढ़ावा देना इसका प्रमुख लक्ष्य है। इसके प्रचार-प्रसार सरकारी कार्यालयों, स्कूलों, कॉलेजों और समाज में हिंदी के उपयोग को प्रोत्साहित करना है।

 

          अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव के बीच हिंदी को मजबूत बनाना है। राष्ट्रीय एकता के अंतर्गत बहुभाषी भारत में हिंदी संपर्क भाषा के रूप में काम करती है और विभिन्न क्षेत्रों को जोड़ती है।

सांस्कृतिक विरासत हिंदी साहित्य, कविता, सिनेमा और डिजिटल मीडिया में इसके योगदान को याद करना और नई पीढ़ी को इससे जोड़ना मुख्य उद्देश्य है ।

 

        संवैधानिक कर्तव्य संविधान के अनुच्छेद 351 के तहत हिंदी के विकास और प्रसार का निर्देश है। यह दिन उस दिशा में प्रयास की याद दिलाता है। हिंदी दिवस की प्रासंगिकता

आज जब हिंदी दुनिया की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है (लगभग 60 करोड़ से अधिक लोग), तब यह दिवस हमें याद दिलाता है कि भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक गौरव और आत्म-सम्मान का आधार भी है। स्कूलों-कॉलेजों में निबंध, भाषण, कविता प्रतियोगिताएं और सरकारी कार्यालयों में राजभाषा संबंधी कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

      हिंदी दिवस केवल एक औपचारिक उत्सव नहीं, बल्कि अपनी भाषा के प्रति गर्व, उसके संरक्षण और भविष्य में उसके व्यापक उपयोग का संकल्प लेने का अवसर है। यह हमें याद दिलाता है कि “हिंदी हमारी आत्मा की भाषा है। इसे बोलकर,लिखकर हम अपनी मां और मातृ भाषा का सम्मान करते हैं।

 

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