पढ़ना है तो आदमी को पढ़ने का हुनर सीख हर चेहरे पे लिखा है किताबों से ज्यादा !

Spread the love

 

 प्रभारी सम्पादकः दिनेश शास्त्री

   

                 (नया अध्याय, देहरादून)

 

लेखक : डॉ. धर्मपाल सिंह

 

पढ़ना है तो आदमी को पढ़ने का हुनर सीख

हर चेहरे पे लिखा है किताबों से ज्यादा !

 

 

किताबें आदमी को पढ़ने के लिए ही लिखी जातीं हैं. इसलिए मेरा मानना है कि जिन्हें आदमी को पढ़ना नहीं आता, उन्हें क़िताबें पढ़ने से भी बहुत लाभ नहीं होगा और जिनके पास आदमी को पढ़ने की तर्बियत है उन्हें क़िताबें पढ़ने की जरूरत नहीं है ! मेरे हाथों में जिस लेखक की क़िताब है उस आदमकद आदमी को मैं पिछले 11 साल से पढ़ रहा हूँ और इसीलिए भरोसे के साथ कह सकता हूँ कि जो कुछ किताब में है वह सब कुछ इस आदमी में उपस्थित है। बल्कि बहुत कुछ ऐसा है जो क़िताब में भले ही न दिखाई देता हो लेकिन आदमी में पूरी तरह दिखाई देता है. शायरों ने चेताया है कि हर आदमी में ‘10/20 आदमी’ होते हैं लेकिन इस आदमी को देखकर लगता है कि इसके भीतर और बाहर लगभग एक ही आदमी है ! ऐसे माहौल में जब आस-पास एक ही आदमी के भीतर कई कई आदमी हों, भीतर-बाहर एक ही आदमी होना बहुत जज़्बे और जोखिम का काम है !

 

लेकिन यही इस आदमी की तपस्या है, और इसीलिए इस आदमी की कहानी को पढ़ा जाना चाहिए।

 

एक ऐसे समय में जब सेल्फीमेनिया आत्मसम्मोहन की उच्चतम चोटी को छू रहा हो, जब कुरूप लोगों के पास भी फ़िल्टर लगाकर सुंदर दिखने की सुविधा हो और जब परपीड़ा आनंद अर्थात schadenfreude, सामाजिक व्यवहार बनता जा रहा हो, तब इस क़िताब में आप एक ऐसे आदमी के जीवन और विरासत का अवगाहन करेंगे जिसने आईने की तरह स्वयं को अनावृत किया है और The Rape of Lucrece (1594) में शेक्सपियर की उस पंक्ति को सत्य सिद्ध किया है कि शासकों और सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठित लोगों का चरित्र आईने अथवा पुस्तकों की तरह होना चाहिए ताकि उन्हें सब पढ़ सकें।

 

प्रो. धर्मपाल सिंह जी मेरे हृदय में रहते हैं हालांकि दुनिया के लिए उनका पता सुलतानपुर उत्तर प्रदेश है। वहीं स्थित गनपत सहाय स्नातकोत्तर महाविद्यालय से वर्ष 2017 में डॉ. सिंह असोशिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। वे उन दुर्लभ साधक और मनीषियों में से हैं जिनके ज्ञान और आचरण की सभ्यता ने मेरे जीवन की कई असभ्यताओं का परिष्कार किया है। हजारों दूसरे लोगों की तरह मैं भी उनके इस निःस्वार्थ स्नेह -अवदान के लिए अनुग्रहीत हूँ। उनके बारे में डॉ. अभिषेक पांडेय ने जो कहा है उस कथन के साथ मेरी पूरी सम्मति है

‘मुझे अभी तक के जीवनकाल में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो डॉ. धर्मपाल सिंह सर जैसा संयमी एवं सरल, सिद्धांतवादी एवं सहज, स्पष्टवादी एवं वाकपटु हो’ (‘अपनी और अपनो की नजर में मैं’ पृष्ठ 193)

 

          वर्ष 2022 में प्रो. धर्मपाल सिंह की आत्मकथा– अपनी और अपनों की नज़र में मैं– का पहला संस्करण आया था जिसे बौद्धिक जगत में बहुत सराहा गया. अब द्वितीय संशोधित संस्करण के रूप में उक्त कृति को सर्वभाषा प्रकाशन नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है, बेहतर कागज, कलेवर और कथ्य के साथ।

 

       समझ के गाँव की पाठशाला के विद्यार्थी होने के नाते मुझे महसूस होता है कि डॉ. सिंह अपने परिवेश की निर्मिति हैं। उन्हें बचपन से जो वातावरण मिला उसमें डॉ. धर्मपाल सिंह से कम कुछ हो भी नहीं सकता था ! उन्हें प्रेम और परानुभूति जैसे मूल्यों से समृद्ध ‘आजी’ और दादा मिले, कर्मवीर, दयाभाव और आचरणसिद्ध माता-पिता मिले, विमला देवी जैसी सदाचारी और सेवाभाव से सम्पन्न समर्पित धर्मपत्नी मिलीं, विद्यार्थी जीवन में शक्तिहीनता के भाव से मुक्त कराने वाले और खेलकूद के ज़रिए शारीरिक बल की सौगात देने वाले श्री नरेन्द्रबहादुर सिंह जैसे शिक्षक मिले, मानसिक बल और बौद्धिक आभिजात्य का उपहार देने वाले श्री सरयूप्रसाद पाण्डेय, श्री प्रभाकर पाण्डेय, डॉ. हरिनाथ मिश्र, प्रो. हरिश्चंद्र जोग, प्रो. ललितमोहन पांडेय और अंततः प्रोफेसर प्रताप सिंह जैसे शोध मार्गदर्शक मिले और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए हठयोगी पंडित रामलगन तिवारी जैसे सिद्ध संत मिले, उन्हें मित्रों के रूप में डॉ. जयकरन नाथ तिवारी, डॉ. महेंद्र प्रताप सिंह, डॉ. जे. पी. सिंह, डॉ. अरविंदप्रबोध मिश्र, श्री कमलनयन पाण्डेय और श्री दिनेश सिंह जी जैसे जीवन बोध से उठे हुए बुद्धिजीवी लोग मिले जिन्होंने उनके जीवन को गहराई वाली ऊँचाई प्रदान की. उनके आस-पास समाजसेवा के क्षेत्र में उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में सर्जन डॉ. अरुण कुमार सिंह जैसे लोग उपस्थित हैं. धर्मपाल सिंह जी के साथ प्रो. रामदेव शुक्ल जैसे मनीषी का स्नेह और आशीर्वाद भी है जिनके सुझाव पर उन्होंने सुलतानपुर में 2012 में समाजसेवा को समर्पित लोक सरोकार समिति का गठन किया और उन्हें लेखन की ओर प्रवृत्त किया। लेखक द्वारा ‘अपनी बात’ (पृष्ठ 11) में सूचित किया गया है कि आत्मकथा लिखने की प्रेरणा भी उन्हें प्रोफेसर रामदेव शुक्ल जी ने ही दी। श्रेष्ठ पुरुषों का संग-साथ व्यक्ति को कितना श्रेष्ठ बना सकता है और उससे कितना कुछ श्रेष्ठ सृजित करवा सकता है, डॉ. धर्मपाल सिंह का जीवन इसका प्रमाण है। शुक्ल जी के बारे में आत्मकथा में लेखक लिखते हैं कि ‘वे एक सच्चे साहित्य- साधक हैं। यदि मैं उनके संपर्क में न आया होता, तो लेखन- कार्य में कदापि प्रवृत्त न हुआ होता’           (पृष्ठ 258)। सेवानिवृत्त पी.सी.एस. अधिकारी, Science of Soul के सम्पादक और लेखक श्री दिनेश सिंह के सुझाव पर डॉ. धर्मपाल सिंह ने श्रीअरविन्द के द्वार पर जो दस्तक दी, उसे मैं उनके जीवन की एक बड़ी घटना मानता हूँ और पिछले एक दशक में एक अत्यंत उर्वर लेखक के रूप में उनके उभार का आधार-आशीर्वाद भी. श्रीअरविन्द चेतना की एक अनिर्वचनीय ऊँचाई हैं। ‘द लाइफ़ डिवाइन’ उनकी साधना का नवनीत है जिसका रसास्वादन करके लेखक को वह अनुभूति हुए जिसे सावित्री ‘All knowledge ended in the Unknowable’ कहकर बयां करती है। डॉ. सिंह लिखते हैंः 

 

‘द लाइफ डिवाइन’ ने मेरे चिंतन के नये गवाक्ष खोलने शुरू कर दिये। अब तक मैंने जितना भी अध्यात्म के बारे में जाना था, वह सब अधूरा लगने लगा।’ (पृष्ठ 260) 

 

इस ‘अधूरेपन’ के कारण लेखक के जीवन में जो पूर्णता आयी है उसके सुफल के रूप में उन्होंने पिछले एक दशक में ‘A Journey through The Life Divine’ (2017, ठीक एक वर्ष बाद दिसंबर 2018 में इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद ‘श्रीअरविन्द कृत दिव्य जीवन : एक अंतर्यात्रा’ भी प्रकाशित हुआ), प्रो. रामदेव शुक्ल द्वारा रचित ‘बेघर बादशाह’ और ‘ग्रामदेवता’ जैसी कृतियों का ‘A King without Home’ और ‘Village-gods’ के रूप में अनुवाद, ‘विचार- वीथी’ (निबंध, समीक्षा और आलेख संकलन), आत्मकथा (2022, 26) और ‘Mastering English : A Practical Approach’ (2022, 24) जैसी मूल्यवान रचनाओं का लेखन किया है. अब दिवंगत विद्वान प्रो. S Z H Abidi ने लेखक से कहा था कि Village-god पहला भोजपुरी उपन्यास है जिसका अनुवाद अँग्रेजी में हुआ है. इस पुस्तक को वर्ष 2021 में प्रतिष्ठित ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के द ओरिएंटल इंस्टिट्यूट के पुस्तकालय में स्थान मिला है. मुझे लगता है कि अगले एक दशक में वे और भी अर्थपूर्ण सृजन करेंगे और स्वयं के साथ साथ अपने समय और समाज को भी दृष्टिसम्पन्न करेंगे। प्रत्येक अच्छे लेखक को उसका अभी तक का लिखा हुआ सब कुछ ‘रफ वर्क’ महसूस होना चाहिए, यही ‘फेयर वर्क’ की सर्वश्रेष्ठ तैयारी है।

 

अब बात फ़िर से ‘अपनी और अपनों की नजर में मैं’ कृति की। इस पुस्तक का पठनीय प्राक्कथन प्रो. रामजी तिवारी ने लिखा है जो बम्बई विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष रहे हैं। पाठक कालक्रमानुसार जीवन का ब्यौरा न खोजने लगे, इसके लिए प्रो. तिवारी ने लिखा है कि ‘…यह जीवन के विकास-क्रम की सूचीबद्ध ‘जीवनी’ नहीं, जीवन की आंतरिक प्रेरणाओं, परिस्थितियों, प्रतिक्रियाओं और प्रतीतियों का वस्तुनिष्ठ समाकलन करने वाली ‘आत्मकथा’ है’ (पृष्ठ 14)। कुल 290 पृष्ठों की इस पुस्तक में चार अध्याय सबसे महत्वपूर्ण हैं। पहला, ‘जिनसे मैं अनृण नहीं’, दूसरा ‘अपनी नजर में मैं’, तीसरा, ‘अपनों की नजर में मैं’ और चतुर्थ अध्याय का शीर्षक है ‘मेरे जीवन निर्माता’ जिसमें आत्मकथाकार ने अपने जीवन को सँवारने वाले संतों, गुरूओं और विचारवान मित्रों का भावपूर्ण कृतज्ञता स्मरण किया है। चार पृष्ठों के उपसंहार के उपरांत 15 पृष्ठों में ‘चित्रवीथी’ के माध्यम से जीवन की झांकियां प्रस्तुत की गई हैं।

 

पुस्तक में ‘अपनी और अपनो’ की नज़र में लेखक के जिन पाँच गुणों की सबसे ज्यादा चर्चा हुई है वे हैं : परदुःखकातरता, स्पष्टवादिता/सत्यवादिता, कर्तव्यपरायणता, अनुशासनप्रियता और परिवार और समाज से संबंधों को निरंतरता के साथ निभाने की उनकी सराहनीय आदत. यही पाँच गुण इस पुस्तक का केन्द्रीय भाव हैं (और कात्मकथाकार के जीवन के स्थायी भाव भी !) और इन्हीं के इर्द गिर्द उनके शिक्षकों, मित्रों, सहकर्मियों और शिष्यों ने उन्हें याद किया है। ‘जिनसे मैं अनृण नहीं’ अध्याय के 36 पृष्ठों में लेखक ने अपने दादा- दादी, माता- पिता और जीवनसंगिनी के ऋण को खुले मन से स्वीकार किया है. उन्होंने स्वीकार किया है कि परदुःखकातरता और स्पष्टवादिता का गुण उन्हें अपनी अम्मा से मिला है               (पृष्ठ 49/51), अनुशासनप्रियता का सद्गुण उन्हें अपने दादा श्री शिव बहादुर सिंह से मिला (पृष्ठ 83) जबकि सहजता और सत्यनिष्ठा का सबक उन्होंने अपने ‘बाबू जी’ श्री रामबरन सिंह से सीखा. वे लिखते हैं :

‘…असली अर्थों में मेरे बाबू ‘साधू’ थे। किसी तरह का कोई नशा नहीं। सदैव शांत मुद्रा में रहने वाले। जब किसी के पम्पसेट से खेत में सिंचाई करवाते तो तुरंत पैसा दे देते…अगर 51 रुपये सिंचाई का देना है तो 51 रुपया ही देते थे , 50/ नहीं, जैसा कि सामान्यतया लोग करते हैं।’ (पृष्ठ 41) 

 

समीक्षक ने पाया कि अपने परिवारजनों में लेखक सबसे निकट अपनी दादी यानी ‘आजी’ के रहे हैं। आत्मकथा के सबसे मार्मिक प्रसंगों में एक कक्षा 8 की बोर्ड परीक्षा में लेखक के अनुत्तीर्ण होने की खबर सुनकर उनकी आजी का रातभर रोना है जिसका लेखक के सुकुमार हृदय पर गंभीर असर हुआ : ‘जब चौबे चाचा ने आजी को बताया कि मैं फेल हो गया हूँ और मेरे गाँव के मेरे साथ पढ़ने वाले सब बच्चे पास हो गए हैं तो मेरी आजी बहुत दुःखी हुईं…वे रोने लगीं। इसके पहले मैंने आजी को कभी रोते हुए नहीं देखा था। उस रात न तो उन्होंने खाना खाया, न मैंने…आजी के रोने का मेरे मन पर बहुत गहरा असर पड़ा और मैंने मन ही मन ठान लिया कि अब मैं ठीक से पढ़ूँगा।’

 

बालक धर्मपाल पर स्नेह-निधि और वात्सल्य बोध का सारा आगार लुटाने वाली आजी को लेखक ने अपने लिए ‘अक्षय कवच’ (पृष्ठ 34) कहा है। प्रेम, सहृदयता, सदाशयता और निश्छल परोपकार के मूलभूत सबक हमारे लेखक ने अपनी अनपढ़ आजी की पाठशाला में बखूबी सीखे। श्रीअरविन्द अपनी पुस्तक Early Cultural Writings में लिखते हैं कि नैतिकता और नैतिक शिक्षा कभी भी ‘पढ़ाकर’ नहीं दी जा सकती क्योंकि ‘हृदय मस्तिष्क नहीं है, the heart is not the mind’. उनका कहना है कि नैतिक शिक्षा सदैव आचरण की निःशब्द सभ्यता द्वारा ही सिखाई जा सकती है. दूसरों से प्रेम करना, उनकी परवाह करना और धार्मिक और जातीय संकीर्णताओं से परे होकर मानव जीवन का आदर करना डॉ. सिंह ने अपनी आजी से सीखा है, उन्हें इन मूल्यों को आचरण में सिद्ध करते हुए. वे लिखते हैं :

 

‘गर्मी के दिनों में मेरी आजी मुझसे घर के सामने के कुएँ पर बाल्टी में पानी रखवाती थीं और साथ में एक मौनी में गुड़। मेरे घर के सामने एक रास्ता था जिस पर लोग आते- जाते रहते थे। लोग जानते थे कि मेरे घर पर किसी को भी पानी पीने को मिल जाएगा तो लोग आते, पानी पीते और नीम की छाँव में कुछ देर बैठकर चले जाते। मेरी आजी…राहगीरों से बात करती रहती थीं। मैंने उन्हें कभी किसी की जाति पूछते हुए नहीं देखा था ।’   (पृष्ठ 68)

 

आजी कबीर को बिना पढ़े कबीर को जीती थीं ! 

 

         डॉ. सिंह ने अपने व्यक्तित्व के विभिन्न आयामों की चर्चा ‘अपनी नजर में मैं’ अध्याय के मार्फत की है। उन्होंने अपने जीवन का निर्माण करने में सहृदयता, स्पष्टवादिता, अनुशासनप्रियता, सामाजिकता, कृतज्ञता, आध्यात्मिकता और मितव्ययिता जैसे जीवन मूल्यों के योगदान को उदाहरण सहित अभिव्यक्त किया है और साथ साथ अपनी क्रोध और भावुकता जैसी कमजोरियों पर भी चर्चा की है। प्रायः होता यह है कि पढ़ लिखकर व्यक्ति जब कामयाब होता है तो शायद ही कभी अपने गाँव और समाज के लोगों को ऊपर उठाने की सोचता है। उत्तराखंड में भी ऐसे बहुत सफल लोग गिनती के हैं जिनकी प्रसिद्धि, प्रतिभा और संबंधों का लाभ उनके गाँव समाज को मिला हो. डॉ. सिंह का जीवनवृत्त पढ़कर पाठक जान पाता है कि उन्होंने पूरी जिंदगी अपने गाँव सडांव सहित सुलतानपुर नगर में अनवरत प्रतिभाशाली विद्यार्थियों, ग़रीबों, पिछड़ों और साधनहीन लोगों की सहायता की हैवे अवकाश के दिनों में भी अकेले विद्यार्थी को पढ़ाने के लिए साइकिल पर 08 किलोमीटर गए हैं (पृष्ठ 107)। दूसरों के सुख से दुःखी होने वाले इस समाज में आज ऐसे लोग गिनती के हैं जो दूसरों के दुःख को अपना दुःख समझते हैं और उसके निदान का उपाय सोचते हैं. पृष्ठ 70 पर एक प्रेरक किस्सा तब का है जब डॉ. सिंह की उम्र केवल 15 साल की थी. बाढ़ के मौसम में गाँव की एक महिला के जीवन की रक्षा के लिए वे गोमती के प्रवाह के विपरीत तैरते हुए 2 किलोमीटर दूर आर्मी की टुकड़ी के पास पहुँचे और वहाँ से एक डॉक्टर को स्टीमर पर बिठाकर अपने गाँव ले आये और महिला की जीवन रक्षा की। वे लिखते हैं, ‘मैं आज भी किसी व्यक्ति की तकलीफ की अनदेखी नहीं कर पाता हूँ’ (पृष्ठ 70)

 

डॉ. सिंह को अपना एक ‘अप्रतिम विद्यार्थी’ मानने वाले उनके गुरु प्रो. ललितमोहन पाण्डेय अपने शिष्य के परदुःखकातरता गुण से बहुत प्रभावित हैं। वे लिखते हैं, ‘…प्रायः लोग दूसरों के दुःख से भावुक होकर दो शब्द बोल देते हैं या भावविगलित होकर दो अश्रुबिंदु गिराकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं, लेकिन धर्मपाल उन विरले लोगों में प्रथम पंक्ति में हैं, जो विपदा- पीड़ित व्यक्तियों की सहायता और उससे मुक्ति के उपाय में पूर्ण मनोयोग से लग जाते हैं।’       (पृष्ठ 133)

संग्रह सुख का आधार कभी नहीं रहा है। सुख का आधार प्रत्येक कालखंड में और प्रत्येक संस्कृति और समाज में सदैव यह रहा है कि हमने दूसरों के दुःख को, अभाव और अवसाद को, भय और विपदा को कितनी सत्यनिष्ठा से कम करने की कोशिश की है। Up From Slavery के ‘Helping Others’ अध्याय में बूकर टी. वाशिंगटन लिखते हैं : I began learning that those who are happiest are those who do the most for others. डॉ. सिंह का जीवन वाशिंगटन के कथन को सत्य सिद्ध करता है.

 

सहृदय, मैत्रीपूर्ण और करुणामय व्यक्ति धरती पर मनुष्य की संभावना भी है और ईश्वर के अंकुरण की भी. ‘अपनों की नज़र में मैं’ अध्याय के माध्यम से सुलतानपुर के प्रबुद्ध समाज के कई व्यक्तियों ने डॉ. सिंह के प्रति अपनी भावनाएं, स्नेहासिक्त स्मृतियां और स्नेह -अवदान के लिए कृतज्ञता प्रकट की है. इनमें प्रो. रामदेव शुक्ल, श्री सोमेशशेखरचन्द्र, श्री दिनेश सिंह, श्री हरिशंकर सिंह, इंजीनियर ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह, पत्रकार श्री राज खन्ना, डॉ. महेंद्र प्रताप सिंह,महामहोपाध्याय आचार्य जयप्रकाश नारायण द्विवेदी, डॉ. प्रभाकर मिश्र, डॉ. जयकरन नाथ तिवारी, डॉ. अरविंदप्रबोध मिश्र, डॉ. शिवाकांत त्रिपाठी, डॉ. अभिषेक पाण्डेय, डॉ. वंदना श्रीवास्तव, श्रीमती मधु गर्ग, प्रो. कृष्णमोहन पाण्डेय और प्रो. वेदव्यास जयप्रकाशनारायण द्विवेदी सम्मिलित हैं। डॉ. सुशील कुमार शुक्ल ने एक स्तरीय कविता के माध्यम से उन्हें “कर्म की दीपित मशाल”(पृष्ठ 168) कहा है तो महामहोपाध्याय डॉ. द्विवेदी ने “असंभवशीलता की भूमि में सम्भावना के बीज बोने”         (पृष्ठ 173) वाला किसान कहा है।

 

इस पुस्तक में लेखक ने कई स्थानों पर अपने स्वभाव और व्यक्तित्व की कुछ कमज़ोरियों की खुलकर चर्चा की है जो पुस्तक की उपादेयता और प्रामाणिकता को बढ़ा देता है। महान आत्मकथाओं /संस्मरणों की एक प्रमुख विशेषता यह होती है कि उनमें नायक अपने दोष, दुर्गुणों और असफलताओं की पूरी निष्पक्षता से चर्चा करते हैं ताकि आने वाली पीढियां उनसे सबक और प्रेरणा ले। इस पुस्तक के पृष्ठ 34 पर लेखक बचपन की उस घटना का जिक्र करते हैं जब कुसंग के प्रभाव में घर में 10 रुपये की चोरी करने के कारण लेखक को अपने दादा ने ख़ूब मार पड़ी और उस घटना के उपरांत उन्होंने आजीवन मितव्ययिता का सबक सीखा। इसी प्रकार अपनी नज़र में स्वयं की चर्चा करते हुए पहला अध्याय में वे विस्तार से अपने क्रोध रूपी दुर्गुण की चर्चा करते हैं जिसके कोप का भाजन किसी न किसी रूप में उनके संपर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को बनना पड़ा. (पृष्ठ 62) समय के साथ साथ डॉ. साहब ने इस बात को महसूस किया है कि उन्हें अपनी कठोर अनुशासनप्रियता, समयनिष्ठा और स्वभावगत क्रोध दूसरों पर सख़्ती के साथ नहीं लादना चाहिए था। विकास करने का, वस्तुओं और मूल्यों, आदतों और प्रभावों को आत्मसात करने का मानव स्वभाव का एक सहज मार्ग है। किसी भी तरह की जबरदस्ती शिक्षण प्रक्रिया का हिस्सा नहीं होनी चाहिए. इस बात को समझने में शायद हमारे लेखक से बड़ी चूक हो गई। वे स्वीकारोक्ति करते हैं  ‘…आज मुझे यह स्वीकारने में कोई संकोच नहीं है कि मेरा अनुशासित रखने का तरीका ठीक नहीं था’ (पृष्ठ 84)। इसी प्रकार पृष्ठ 102-3 पर भी वे स्वीकार करते हैं कि Science of Soul पत्रिका में The Life Divine पर उनके लेख की जिस तरह विद्वत समाज में सराहना हुई उसके कारण उनके भीतर अहंकार आ गया लेकिन जल्दी ही श्रीअरविन्द ने उनके इस अहंकार का शमन भी कर दिया।

 

पुस्तक के ‘मेरे जीवन निर्माता’ अध्याय के माध्यम से डॉ. सिंह ने उन तेरह प्रेरक व्यक्तित्वों की चर्चा की है जिन्होंने अलग अलग माध्यम से उन्हें प्रेरित, पोषित और प्रभावित किया और जिनके अवदान के सामने कदाचित ‘धन्यवाद’ भी छोटा सा शब्द है। इस सूची में अधिकांश नाम उनके शिक्षकों और मित्रों के हैं जबकि पहला नाम स्वामी अशोकानंद जी का है। डॉ. सिंह के जीवन पर महान संत हठयोगी पंडित रामलगन तिवारी (1890–2003) का गहरा प्रभाव है जो गोमती नदी के किनारे एक गुफा में योगाभ्यास करते थे। धर्मपाल जी उनकी शिक्षाओं पर आधारित एक पुस्तक का लेखन भी कर रहे हैं। अपने सबसे घनिष्ठ मित्र डॉ. जयकरन नाथ तिवारी के बारे में उन्होंने लिखा है, ‘इसमें कोई दो राय नहीं कि मेरी सभी उपलब्धियों में उनका सहयोग अंतर्निहित है। अगर (डॉ.) जयकरन नाथ तिवारी जैसा मित्र मुझे न मिला होता, तो शायद मैं वह न कर पाता जो कर सका।’ (पृष्ठ 237), अपने शोध निर्देशक प्रो. प्रताप सिंह के प्रति उनकी श्रद्धा सम्पूर्ण पुस्तक में परिलक्षित होती है.

 

अब थोड़ी सी चर्चा पुस्तक की कमियों के बारे में. मेरा मानना है कि ‘अपनो की नजर में मैं’ अध्याय में उनकी धर्मपत्नी श्रीमती विमला देवी, अनुज श्री समर बहादुर और उनके बच्चों में से सभी का अथवा किसी एक का वक्तव्य अवश्य दिया जाना चाहिए था क्योंकि उन्होंने ही लेखक को सबसे निकटता से देखा और ‘झेला’ है। मुझे भरोसा है पुस्तक के तृतीय संस्करण में इस कमी को पूरा किया जाएगा। चित्रवीथी में कैप्शन पठनीय हैं लेकिन छायाचित्रों की स्पष्टता नहीं है। भावी संस्करण में कुछ चित्रों को और शामिल किया जा सकता है जैसे बाबा रामलगन तिवारी की गुफा, पैतृक गाँव/घर के चित्र, आजी का नीम का पेड़ और दादा के ‘आश्रम’ सहित लोक सरोकार समिति का कार्यालय और बचपन की कुछ अन्य छवियाँ। पुस्तक में ‘अपनों’ ने लेखक के बारे में जो कुछ लिखा है उसमें पुनरूक्ति दोष आ गया है जिससे बचा जा सकता था। उनके लेखन और पुस्तकों की चर्चा की कई बार पुनरावृत्ति हुई है। पुस्तक में टाइम टेबल (पृष्ठ 85, 107), इवोल्यूशन (पृष्ठ 105), चित्तरंजन  (पृष्ठ 89), और Personal, Impersonal (पृष्ठ 271) जैसे शब्द अशुद्ध छप गए हैं जिन्हें भावी संस्करणों में सुधारा जाना चाहिए.

 

मैं एक आदमक़द जीवन जीने के लिए डॉ. सिंह को हार्दिक बधाई देता हूँ और इस पुस्तक को विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, सार्वजनिक पुस्तकालयों, शोध केंद्रों और लिखे हुए आखर के प्रेमियों के लिए बहुत उपयोगी मानता हूँ। इस महनीय जीवन की सुवास को जनता तक जाना चाहिए, उस तरह जैसे पतझड़ के कानो में ऋतुराज की खबर जाती है…।

 

पुस्तक : अपनी और अपनों की नजर में मैं

लेखक : डॉ. धर्मपाल सिंह

प्रकाशक : सर्वभाषा प्रकाशन नई दिल्ली

वर्ष : 2026

मूल्य : 999/

पृष्ठ : 290.

 

E-mail : dpsingh 1818@gmail.com

 

चरणसिंह केदारखंडी, देहरादून, उत्तराखंड।

 

  • Related Posts

    बच्चों की सुरक्षा और अधिकारों से समझौता स्वीकार्य नहीं—योगेश सिंह रजवार।

    Spread the love

    Spread the love  मीडिया प्रभारी अल्मोडा़ः दिनेश भट्ट                            (नया अध्याय, देहरादून)   बच्चों की सुरक्षा और अधिकारों से…

    अपर जिलाधिकारी एवं जिला जनगणना अधिकारी युक्ता मिश्रा की अध्यक्षता में आगामी जनगणना 2027 के द्वीतिय चरण में दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम।

    Spread the love

    Spread the love  मीडिया प्रभारी अल्मोडा़ः दिनेश भट्ट                            (नया अध्याय, देहरादून)     अपर जिलाधिकारी एवं जिला जनगणना…

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    You Missed

    पढ़ना है तो आदमी को पढ़ने का हुनर सीख हर चेहरे पे लिखा है किताबों से ज्यादा !

    • By User
    • September 15, 2026
    • 12 views
    पढ़ना है तो आदमी को पढ़ने का हुनर सीख  हर चेहरे पे लिखा है किताबों से ज्यादा !

    बच्चों की सुरक्षा और अधिकारों से समझौता स्वीकार्य नहीं—योगेश सिंह रजवार।

    • By User
    • September 15, 2026
    • 12 views
    बच्चों की सुरक्षा और अधिकारों से समझौता स्वीकार्य नहीं—योगेश सिंह रजवार।

    अपर जिलाधिकारी एवं जिला जनगणना अधिकारी युक्ता मिश्रा की अध्यक्षता में आगामी जनगणना 2027 के द्वीतिय चरण में दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम।

    • By User
    • September 15, 2026
    • 13 views
    अपर जिलाधिकारी एवं जिला जनगणना अधिकारी युक्ता मिश्रा की अध्यक्षता में आगामी जनगणना 2027 के द्वीतिय चरण में दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम।

    कोतवाली द्वाराहाट पुलिस ने दूरस्थ ग्राम नायल में चलाया जागरूकता अभियान।

    • By User
    • September 15, 2026
    • 14 views
    कोतवाली द्वाराहाट पुलिस ने दूरस्थ ग्राम नायल में चलाया जागरूकता अभियान।

    मुख्य विकास अधिकारी रामजी शरण शर्मा की अध्यक्षता में विकास भवन जनपद में संचालित 20 सूत्रीय एवं 25 सूत्रीय कार्यक्रमों की प्रगति समीक्षा बैठक।

    • By User
    • September 15, 2026
    • 8 views
    मुख्य विकास अधिकारी रामजी शरण शर्मा की अध्यक्षता में विकास भवन जनपद में संचालित 20 सूत्रीय एवं 25 सूत्रीय कार्यक्रमों की प्रगति समीक्षा बैठक।