संजय सोंधी,
(संयुक्त निदेशक)
शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
स्थापत्य और आस्था का अनुपम प्रतीक।
मदुरै का ऐतिहासिक मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर
तमिलनाडु की सांस्कृतिक राजधानी मदुरै में वैगई नदी के दक्षिणी तट पर स्थित मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर स्थापत्य कला, आध्यात्मिक गहराई और ऐतिहासिक निरंतरता का एक ऐसा अनूठा परिसर है, जिसकी परंपराएं हजारों वर्षों के इतिहास को समेटे हुए हैं। धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक आख्यानों के अनुसार, देवी मीनाक्षी (पार्वती का रूप) पांड्य राजवंश के राजा मलयध्वज पांड्य और उनकी रानी कंचनमाला की पुत्री के रूप में प्रकट हुई थीं। तीन वक्षों के साथ जन्मी इस अलौकिक राजकुमारी के बारे में भविष्यवाणी हुई थी कि जब वह अपने भावी पति से मिलेंगी, तब उनका तीसरा वक्ष स्वतः विलुप्त हो जाएगा। दिशा-विजय के दौरान जब राजकुमारी मीनाक्षी ने कैलाश पर्वत पर भगवान शिव को देखा, तो भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई। तत्पश्चात मदुरै में देवी मीनाक्षी और भगवान शिव (सुंदरेश्वर रूप में) का भव्य दिव्य विवाह संपन्न हुआ। यही कारण है कि इस मंदिर परिसर में पारंपरिक रूप से सर्वप्रथम देवी मीनाक्षी की पूजा की जाती है और उसके बाद ही भगवान सुंदरेश्वर के दर्शन का विधान है।
ऐतिहासिक दृष्टि से इस मंदिर की नींव छठी शताब्दी ईसा पूर्व में पांड्य राजा कुलशेखर पांड्य द्वारा रखी गई थी, जिसका प्राचीन संगम साहित्य में विस्तृत वर्णन मिलता है। इस परिसर को युगों-युगों से कई महान राजवंशों का निरंतर संरक्षण और संरक्षण प्राप्त हुआ। प्रथम पांड्य साम्राज्य के बाद 13वीं शताब्दी में मारवर्मन सुंदर पांड्य प्रथम और जटावर्मन सुंदर पांड्य प्रथम के शासनकाल में मंदिर का बृहद विस्तार किया गया। 14वीं शताब्दी के आरंभ में मलिक काफूर के आक्रमण के दौरान मंदिर परिसर और शहर को भारी क्षति पहुंची थी, परंतु जल्द ही विजयनगर साम्राज्य के शासकों, जैसे कुमारा कंपना, ने इस क्षेत्र को पुनर्स्थापित कर मंदिर के जीर्णोद्धार का मार्ग प्रशस्त किया। तत्पश्चात 16वीं और 17वीं शताब्दी के दौरान मदुरै के नायक राजवंश, विशेष रूप से विश्वनाथ नायक, मुथु कृष्णप्पा नायक और तिरुमलाई नायक के संरक्षण में मंदिर का व्यापक पुनरोद्धार, सौंदर्यीकरण और विशाल गोपुरमों का निर्माण पूरा हुआ, जिससे इसे वर्तमान भव्य स्वरूप प्राप्त हुआ।
वास्तुकला की दृष्टि से 45 एकड़ में फैला यह मंदिर द्रविड़ स्थापत्य कला का एक बेजोड़ शिखर है। संपूर्ण परिसर के चारों ओर विशाल प्राचीरें हैं और इसमें प्रवेश के लिए 14 भव्य गोपुरम (प्रवेश द्वार) बनाए गए हैं, जिनमें से सबसे ऊंचा दक्षिणी राजगोपुरम 51.9 मीटर (170 फीट) ऊंचा है। ये गोपुरम पौराणिक आख्यानों, यक्षों, देवी-देवताओं और असुरादि की हजारों रंगीन एवं बारीक मूर्तियों से आच्छादित हैं। मंदिर के दो मुख्य गर्भगृहों के ऊपर स्वर्ण-मंडित ‘विमानम’ (गोल्डन विमानम) स्थापित हैं—एक देवी मीनाक्षी का और दूसरा भगवान सुंदरेश्वर का। मंदिर के आंतरिक प्रांगणों में कई प्रसिद्ध मंडप निर्मित हैं। इनमें ‘अयिरम काल मंडपम’ (1000 स्तंभों वाला हॉल) स्थापत्य का एक रत्न है, जिसमें वास्तव में 985 तराशे हुए पत्थर के खंभे हैं, जिन पर द्रविड़ नक्काशी और पौराणिक आकृतियों का अद्भुत काम है। इसी प्रांगण में एक ही पत्थर से निर्मित ‘संगीत स्तंभ’ (म्यूजिकल पिलर्स) मौजूद हैं, जिन्हें हाथ से थपथपाने पर सातों संगीत के स्वर (सप्तस्वर) गूंज उठते हैं। इसके अलावा मंदिर के हृदय स्थल पर ‘पोट्रामराई कुलम’ (स्वर्ण कमल तालाब) स्थित है, जो आगम शास्त्र के अनुसार एक परम पवित्र जल निकाय है।
आगम शास्त्रों और द्रविड़ मंदिर परंपराओं के अनुसार, मंदिर की दैवीय ऊर्जा को जीवंत रखने और पुरातात्विक क्षरण की मरम्मत हेतु प्रत्येक 12 से 15 वर्षों के अंतराल पर ‘महा कुंभाभिषेकम’ (संप्रोक्षण एवं पवित्र जलाभिषेक) आयोजित करना अनिवार्य होता है। इससे पूर्व यह अनुष्ठान 8 अप्रैल 2009 को हुआ था। हालांकि, 2 फरवरी 2018 को मंदिर के ऐतिहासिक ‘वीर वसंतरायर मंडपम’ में अचानक हुई भीषण आगजनी के कारण कई खंभों और छतों को नुकसान पहुंचा था। मंदिर प्रशासन और पुरातत्वविदों ने निर्णय लिया कि जब तक ऐतिहासिक मंडप का प्राचीन वैभव के साथ संपूर्ण पुनरुद्धार नहीं हो जाता, तब तक कुंभाभिषेकम नहीं किया जाएगा। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई), आईआईटी मद्रास के विशेषज्ञों और पारंपरिक स्थापत्य शिल्पकारों की देखरेख में चले इस गहन जीर्णोद्धार (थिरुपनी) के कारण इस बार 17 वर्षों का समय लगा। अंततः 186 संरक्षण कार्यों (कुल लागत ₹32.29 करोड़) के पूर्ण होने के बाद 17 सितंबर 2026 को सुबह 7:40 से 8:10 बजे के मध्य पवित्र मंत्रोच्चार और कलशों के संप्रोक्षण के साथ ऐतिहासिक महा कुंभाभिषेकम संपन्न हुआ।
भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय और तमिलनाडु के हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती (HR&CE) विभाग द्वारा इस विश्वप्रसिद्ध मंदिर को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में स्थायी रूप से अंकित कराने के गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं। वर्तमान में यह परिसर यूनेस्को की टेंटेटिव (संभावित) सूची में दर्ज है। जीर्णोद्धार प्रक्रिया के दौरान आधुनिक रसायनों का त्याग कर चूना, गुड़, गन्ने के रस और प्राकृतिक जड़ी-बूटियों जैसी पारंपरिक सामग्रियों का उपयोग किया गया है ताकि संरचना की ऐतिहासिक अखंडता बनी रहे। इस वैज्ञानिक संरक्षण के माध्यम से वैश्विक मानकों को पूरा करते हुए इसे शीघ्र अति शीघ्र पूर्ण यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा दिलाने की प्रक्रिया को गति दी जा रही है।







