सुश्री सरोज कंसारी
(कवयित्री, लेखिका व शिक्षिका)
रिपोर्टर एवं उद्घोषिका
नवापारा-राजिम, रायपुर (छत्तीसगढ़)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
आलेख:
निरंतर कर्मशील रहने से व्यक्ति कभी निराश नहीं होता
: सुश्री सरोज कंसारी
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मनुष्य के मन में असीम क्षमता होती है। मन की शक्ति के बल पर हर कोई अद्भुत कार्य कर सकता है। दुनिया में जितने भी आश्चर्यजनक कार्य हुए हैं, उन सबके पीछे बल, बुद्धि, विद्या और सही सोच ही है। अगर हम जीवन के मोड़ पर विविध चुनौतियों से घबराए बिना धैर्य से काम लें और समस्याओं के सभी पक्षों पर चिंतन कर कार्य करें, तो बेवजह की यातनाओं से बच सकते हैं। जिससे बिगड़े हुए हर काम को बना लेने का साहस उत्पन्न कर सकते हैं। सोच हर समय सकारात्मक रखें और छोटी-छोटी बातों को दिल में न रखकर, विशाल हृदय रखकर लोगों को उनकी गलतियों के लिए क्षमा करते चलें, तो मानसिक तनाव नहीं होगा। जीवन में खुशियाँ लाने के लिए मन को हर तरह की नकारात्मक बातों से मुक्त करना जरूरी है। जब हम स्वतंत्र विचारधारा रखते हैं और किसी के प्रति छल-कपट, ईर्ष्या न रखकर अपने जीवन के हर पल को आनंदित बना लेते हैं। ज्यादा सुख-सुविधा के पीछे न भागकर संघर्ष के पथ पर चलते हुए भी जब औरों के दुःख-सुख में सहभागी बनते हैं, जहाँ हँसने-मुस्कुराने की छोटी-सी वजह भी मिले तो ठहर जाते हैं, तब हम सुकून के पल पाकर खुद में नई ताजगी महसूस करते हैं। जीवन में दुःख-दर्द, तकलीफें आती ही रहेंगी। किसी की कड़वाहट भरी बातें सीने में चुभेंगी भी। कभी-कभी अपनों के होते हुए भी अकेलेपन का एहसास भी होगा। बिना गलती के भी सजा मिलती है। बेवजह इल्जाम भी लगते हैं। जिसके लिए सब कुछ समर्पित करते हैं, वही दुत्कार भी देता है। उम्मीदें भी टूटती हैं, डर-भय और दहशत से मानसिकता भी शून्य हो जाती है। हर तरफ से तनाव से घिर जाते हैं, यही जिंदगी है। हर कदम पर एक नई घटना, हादसे, होनी और अनहोनी से होकर हमें गुजरना पड़ता है, हमें नई-नई बातें सुनने-देखने को मिलती हैं। इस बात को अच्छी तरह मन में बैठा लें, अगर जीवन में शांति स्थापित करनी है तो हर परिस्थिति में जीने की चाह रखिए। समस्याओं से घबराकर मर जाना तो पल भर की बात है, पर हर कठिनाई से लड़कर जीवित रहना मनुष्य जीवन का धर्म है। मौत को गले लगाना मतलब जिम्मेदारियों से भागना और औरों को कष्ट देने के समान है। क्योंकि रिश्तों की दुनिया में रहकर हमसे बहुत लोगों की उम्मीदें जुड़ी होती हैं, उन्हें पूर्ण करना और उन्हें मजबूती प्रदान करना हमारा कर्तव्य है। अपने कर्म से उदास, गमगीन माहौल में एक नयापन लाते रहिए। सृजनशील बनिए। जिससे भी मिलें, प्रेम से मिलें, हर कड़वाहट को भूलकर इंसानियत का परिचय देते रहिए। जो उचित है वही कीजिए, किसी के बहकावे में आकर सच्चाई का मार्ग मत छोड़िए। हर वो पुण्य कर्म करते रहिए जिससे औरों का भला होता रहे। अपनी जिंदगी से अनावश्यक तनाव के बोझ को कम करने के लिए नई खोज कीजिए। हिम्मत रखिए और विश्वास के साथ आगे ही बढ़ते रहिए। पीछे क्या छूट गया, उसे मत देखिए, बस अच्छे कर्मों में लीन रहिए। अनावश्यक तनाव कम होंगे। हमेशा अपनी शारीरिक-मानसिक ऊर्जा का प्रयोग अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के सुख, समृद्धि और विकास के लिए ही कीजिए, जिससे मन में उत्सुकता और उत्साह बना रहे और अनावश्यक थकान न हो, ऐसे कार्य अवश्य कीजिए।
मानवीय गुणों को खुद में स्थापित करते हुए ऐसे कार्य कीजिए जिससे शांति, सद्भाव, भाईचारा, अपनापन, दया-स्नेह और करुणा का भाव विकसित हो। जिससे असुरक्षा, अशांति, हिंसा, अपराध, मनमुटाव और बैर बढ़े, ऐसे कोई कार्य मत कीजिए। हमेशा शांत, सुखद वातावरण के निर्माण के लिए अग्रसर रहिए। दंगे-फसाद, लड़ाई-झगड़े, आतंक-अत्याचार को जड़ से मिटाकर मानव मात्र की रक्षा में सहयोगी बनें। उलझे-बिखरे, टूटे-रूठे और उदास मन को जीने की वजह दीजिए। मनुष्य ही हर अव्यवस्था को दूर कर नव-निर्माण और सृजन कर सकता है। जरूरत है तो बस एक-दूसरे के विचारों का सम्मान करें, निजी स्वार्थ से ऊपर उठें और मुसीबत में साथ दें। विश्व शांति की दिशा में प्रयास कीजिए, खुद में सुधार कर एक नई शुरुआत कीजिए। मनुष्य के जीवन में क्रोध की एक बूंद भी नहीं होनी चाहिए। अधिक क्रोधित होने से मानसिक संतुलन बिगड़ता है। क्रोधी व्यक्ति शांत, सुव्यवस्थित और सुखी जीवन को कभी-कभी तबाह भी कर देता है। क्रोध में अक्सर सोचने, सुनने और समझने की क्षमता कम हो जाती है। वे बदले की आग में जलने लगते हैं। जितना हो सके दुश्मनी के भाव से बचिए और अपने सान्निध्य में आने वाले हर व्यक्ति से मित्रवत मिलिए। लालच, छल-कपट, भोग-विलास, अत्यधिक दिखावा, संग्रह, ईर्ष्या और मनमुटाव जैसे दुर्गुणों से विनाश की ओर कदम बढ़ते हैं। बुरे कर्म और विचारों से ही भयंकर परिणाम आते हैं। मनुष्य अपने दुर्गुणों से प्रलय की भी क्षमता रखता है, जिससे मानवीय मूल्य धूमिल हो जाते हैं। बहस-विवाद से भी कभी-कभी बेहद नुकसान हो जाता है। जाति-धर्म, मजहब-संप्रदाय के नाम पर कभी झगड़े मत कीजिए। सिर्फ मनुष्यता का रिश्ता निभाइए। बनते को बिगाड़ने की कोशिश मत कीजिए, बस बिखरे को संवारने, सहेजने और समेटने में सहयोगी बनिए। मनुष्य जन्म आपको एक अवसर के रूप में मिला है, इसका भरपूर उपयोग कीजिए। नए, सार्थक और अच्छे विचारों और कार्यों से अच्छे, सुखद और कल्याणकारी माहौल का निर्माण कीजिए। सृजनशील मनुष्य शांत, गंभीर और दिल से काम लेते हैं, वे मानवता के हितैषी होते हैं। लेकिन जिनमें औरों के प्रति संवेदनाएँ नहीं हैं, वे अनुशासनहीनता और दुर्व्यवहार से हमेशा हर जगह व्यवधान ही उत्पन्न करते हैं। मनुष्य ही सृजन और प्रलय का आधार है।
आज हाथों-हाथ और एक-दूसरे का साथ देने का समय है। हर इंसान में अच्छाई के साथ कुछ बुराई होती है। कितनी भी कोशिश कर लें, जीवन के इस सफर में सांसारिक मोह-माया में उलझे हुए मनुष्य पर माहौल का प्रभाव पड़ता ही है। जब हम खुद को सुधारने की कोशिश करते हैं, तब उसमें पूरी मानसिकता लगा देते हैं, क्योंकि हमें एक अच्छा इंसान बनने की चाह होती है। लेकिन जैसे ही हम खुद की बुराई को भूलकर दूसरों में दोष निकालने और बुराई ढूँढ़ने में लगे रहते हैं, उस वक्त हम अपना वजूद भूलने लगते हैं। खुद पर ध्यान नहीं दे पाते, जो अच्छाई हममें होती है उसे भी दूसरे के चक्कर में भूल जाते हैं और हमारी जो मौलिकता होती है वह नष्ट होने लगती है। हम अपना हर क्षण और पल दूसरों के बारे में सोचने, उनके व्यवहार का मूल्यांकन करने में लगा देते हैं, ऐसा करके हम अपने जीवन की शांति नष्ट करते हैं। इस संसार में कई तरह के लोग हैं, उनकी बातें हैं और अपने जीवन जीने की उनकी अपनी आदत या मजबूरी है। उनके जीवन में दखल देने का हमें कोई अधिकार नहीं। ऐसा व्यवहार मत कीजिए जिससे किसी का दिल दुखे। हर एक छोटी-छोटी बात को अपने हृदय में लेकर उसे सोचते रहने से हमें ही नुकसान होता है, इसलिए अपने जीवन को कैसे जीना है, इसके लिए हमारे पास एक स्वस्थ विचार और सकारात्मक सोच होनी चाहिए, ताकि लोगों की बेवजह की बातों में हम न उलझकर अपने कर्म पर ध्यान दे सकें। कर्मशील मनुष्य जीवन में सबसे अधिक सुखी होता है। जीवन जीने के लिए हमें अपनों के साथ और व्यवहार-कुशलता की बहुत जरूरत पड़ती है। क्योंकि दुख, उदासी और तनाव में जब हम तन्हा होते हैं, उस वक्त हम धन-दौलत, बंगले-गाड़ी और बैंक-बैलेंस से बात नहीं कर सकते, उसे गले लगाकर रो नहीं सकते। पैसों से हम आत्मिक खुशी नहीं पा सकते। क्योंकि जो दिल से परवाह करते हैं, विश्वास और प्रेम करते हैं, ऐसे लोग ही हमें आत्मबल देते हैं और जीवन के कड़वाहट भरे इस पल में मिठास घोलकर हमें जीवन को जीने के लिए सुंदर वजह देते हैं। हमेशा सच के साथ रहना चाहिए, चाहे उसके लिए पूरी दुनिया एक तरफ क्यों न हो जाए। सच का रास्ता सीधा होता है, झूठ से हर पल तकलीफ होती है। याद रखिए, गलत कार्य से, गलत सोच से और किसी की हर वक्त बुराई करने से कुछ देर भले ही अच्छा लगे, लेकिन कभी न कभी हम इस सफर में तन्हा, बेबस, लाचार, असहाय, बेचैन और व्याकुल हो जाते हैं। ऐसी अवस्था में आप कितने भी तड़पते रहिए, पर करनी का फल जब मिलता है तब वो नहीं आते जिनके साथ आप अपने अच्छे दिनों में औरों को झुकाने, रुलाने, गिराने और उनकी अच्छाइयों का फायदा उठाने में लगे रहते थे। इसलिए हर क्षण नेकी के कार्य कीजिए। खुद को एकांत में जाकर महसूस कीजिए, जितना अधिक हो सके भलाई करते रहिए। मन के मिलन से ही जीवन में सौंदर्य उत्पन्न होता है। मनमुटाव अक्सर दूरियाँ ही बढ़ाते हैं, इसलिए खुश रहिए, कोई साथ हो या न हो, वजह अपने आसपास ही ढूँढ़ लीजिए।







