डॉ. सुधाकर आशावादी
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
दृष्टिकोण
कुलपति चयन: विद्वता का सम्मान या जुगाड़ का पुरस्कार?
देश में उच्च शिक्षा के नाम पर अनेक राजकीय और निजी विश्वविद्यालय स्थापित हैं। मंडल स्तर पर स्थापित राजकीय विश्वविद्यालयों में कुलपति का मनोनयन सम्बंधित प्रदेशों के राज्यपाल द्वारा किया जाता है। कहने के लिए देश में विद्वता की कमी नहीं है, विभिन्न विश्व विद्यालयों में योग्य शिक्षकों की भी कमी नही है। यदि विद्वता के आधार पर कुलपतियों का चयन किया जाता है, तो कोई शक नहीं कि विद्वानों की लम्बी कतार कुलपति मनोनीत होने की श्रेणी में खड़ी नजर आएगी, किंतु जब राज भवन से कुलपति के मनोनयन के पत्र जारी होते हैं तो लगता है कि राज भवनों के पास कुलपति चयन में विकल्पों का भारी अभाव है।
यदि विकल्पों का अभाव न होता, तो इस पद पर प्रशासनिक अधिकारियों की तरह स्थानांतरण जैसी व्यवस्था का बोध न होता तथा कुलपति चयन में किसी एक ही व्यक्ति का बार बार कुलपति पद पर मनोनयन नहीं किया जाता। किसी एक विश्वविद्यालय में किसी एक ही व्यक्ति को निरंतर दो कार्यकाल न मिलते। यही नहीं किसी एक ही व्यक्ति के लिए चार चार बार कुलपति जैसा गरिमायुक्त पद उपलब्ध न कराया जाता। लगातार एक से अधिक बार कुलपति पद पर आसीन होकर तथाकथित कुलपति अपने पद का दुरुपयोग न कर पाते। विद्वता के स्थान पर अपने राजनीतिक रसूख़ के चलते कुलपति पद पर मनोनीत होकर कुछ लोग अपनी संकीर्ण जातीय मानसिकता के चलते विश्वविद्यालयों में शिक्षा व्यवस्था व परीक्षा व्यवस्था में अपने जातीय बंधुओं को अनुचित लाभ पहुँचाने का दुस्साहस न कर पाते।
विडम्बना है कि जिस देश में शिक्षा सुधार के लिए क्रांतिकारी निर्णय लेना समय की माँग है, उस देश में योग्य विद्वानों की अपेक्षा जुगाड़ बाज लोगों को कुलपति जैसे पद पर आसीन करके शिक्षा में कौन से सुधार की पृष्ठभूमि तैयार की जा रही है। कहीं ऐसा तो नही, कि कुलपतियों का मनोनयन किसी राजनीतिक दवाब या अन्य किसी भ्रष्ट तरीक़े के आधार पर किया जा रहा हो ? कुलपति चयन में सम्बंधित व्यक्ति की शैक्षिक योग्यता, शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान की समीक्षा की भी जाती है या नहीं ? जिन व्यक्तियों का कुलपति पद पर मनोनयन किया जाता है क्या वे अन्य शिक्षाविद विद्वानों की तुलना में अधिक श्रेष्ठ हैं ?
यदि नही तो उनके कुलपति पद पर चयन को कैसे उचित ठहराया जा सकता है ? शिक्षा सुधार एक चुनौती पूर्ण कार्य है। यदि उच्च शिक्षा में सुधार हेतु युवा कर्मठ एवं आधुनिक तकनीक से रहित लोगों को राजनीतिक हस्तक्षेप या अन्य किसी जुगाड़ से कुलपति पद सौंपा जाता है, तो यह देश की उच्च शिक्षा के प्रति घोर निराशाजनक स्थिति होगी। सत्य तो यह है कि कुलपति पद पर चयन की प्रक्रिया नितांत पारदर्शी होनी चाहिए। किसी एक व्यक्ति को अधिकतम एक ही बार कुलपति पद मिले । एक से अधिक बार कुलपति बनाए गए व्यक्तियों की गुप्तचर एजेंसियों से जाँच कराई जाए, कि उनकी योग्यता अन्य समकक्षों के सम्मुख कहाँ ठहरती है। अयोग्य पाए जाने पर उन्हें कुलपति पद से हटाने में कोई संकोच न किया जाए, क्योंकि देखा जाता है कि अनेक कुलपति शिक्षा में सकारात्मक सुधार की जगह अपने स्वार्थ अधिक पूरे करते हैं।
(विनायक फीचर्स)






