✍ आशीष कुमार त्रिवेदी
(एडवोकेट)
बिहार
(नया अध्याम, उत्तराखण्ड)
पितृपक्ष : जड़ों से जुड़ने, पूर्वजों को याद करने
और संस्कारों को आगे बढ़ाने का पर्व।
कुछ लोग हमारे बीच नहीं होते, लेकिन उनकी स्मृतियां, उनके संस्कार और उनके जीवन की सीख हमेशा हमारे साथ रहती है। समय गुजरता जाता है, पीढ़ियां बदलती रहती हैं, लेकिन पूर्वजों की स्मृतियां हमारे भीतर जीवित रहती हैं। पितृपक्ष इन्हीं स्मृतियों को श्रद्धा में बदलने और अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर है।
भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक आने वाला पितृपक्ष केवल कर्मकांड का समय नहीं, बल्कि पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व है। यह हमें याद दिलाता है कि हमारा वर्तमान केवल हमारी अपनी उपलब्धियों का परिणाम नहीं है। इसके पीछे कई पीढ़ियों का संघर्ष, त्याग, तपस्या और संस्कार छिपे हैं। भारतीय परंपरा में मनुष्य पर पितृ ऋण माना गया है। श्राद्ध और तर्पण इसी ऋण के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति हैं। लेकिन श्राद्ध का वास्तविक अर्थ केवल विधि-विधान पूरा करना नहीं, बल्कि पूर्वजों के श्रेष्ठ संस्कारों को अपने जीवन में उतारना भी है।
तर्पण केवल जल अर्पित करना नहीं, बल्कि उनकी स्मृतियों को जीवित रखना भी है। किसी भूखे को भोजन कराना, जरूरतमंद की सहायता करना, किसी वृद्ध का सम्मान करना या किसी असहाय के चेहरे पर मुस्कान लाना भी पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि हो सकती है।
आज जब परिवार छोटे होते जा रहे हैं और जीवन की रफ्तार लगातार तेज हो रही है, तब पितृपक्ष हमें एक बार फिर अपनी जड़ों की ओर लौटने का संदेश देता है। पूर्वजों की तस्वीर पर फूल चढ़ाना सम्मान है, लेकिन उनके आदर्शों को अपने आचरण में उतारना सबसे बड़ा श्राद्ध है।
देशभर में फैले पितृतीर्थ
भारत की सांस्कृतिक परंपरा में अनेक ऐसे तीर्थ हैं, जहां पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध की विशेष मान्यता रही है। स्थान अलग हैं, पर भाव एक ही—पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता।
1. गयाजी, बिहार — पिंडदान की धरती
गयाजी प्रमुख पितृतीर्थों में माना जाता है। विष्णुपद मंदिर, फल्गु नदी और अक्षयवट पितृकर्म के प्रमुख स्थल हैं। पितृपक्ष में देशभर से श्रद्धालु यहां पिंडदान और श्राद्ध के लिए पहुंचते हैं। पुनपुन, प्रेतशिला और विभिन्न वेदियों का भी पितृकर्म की परंपरा में विशेष महत्व है।
2. पुष्कर, राजस्थान — पवित्र सरोवर में तर्पण
ब्रह्मा मंदिर के लिए प्रसिद्ध पुष्कर सरोवर में भी पितरों के निमित्त श्राद्ध और तर्पण की परंपरा रही है।
3. काशी, उत्तर प्रदेश — मोक्ष की नगरी
वाराणसी में गंगा तट पर तर्पण और श्राद्ध की प्राचीन परंपरा है। पिशाचमोचन तीर्थ को भी पितृकर्म से विशेष रूप से जोड़ा जाता है।
4. प्रयागराज, उत्तर प्रदेश — संगम पर तर्पण
गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम की धार्मिक महत्ता के कारण प्रयागराज पितृकर्म का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।
5. हरिद्वार, उत्तराखंड — गंगा तट पर पितृस्मरण
हरकी पौड़ी सहित गंगा के विभिन्न घाटों पर पितरों के निमित्त तर्पण और श्राद्ध की परंपरा है।
6. सिद्धपुर, गुजरात — मातृगया
सिद्धपुर को ‘मातृगया’ कहा जाता है। धार्मिक परंपरा में यह विशेष रूप से माता के निमित्त श्राद्ध और पिंडदान के लिए प्रसिद्ध है।
7. सिद्धवट, उज्जैन — क्षिप्रा तट का पितृतीर्थ
क्षिप्रा नदी के किनारे स्थित सिद्धवट में पितरों के निमित्त तर्पण और श्राद्ध की परंपरा प्रचलित है।
8. रामकुंड, नासिक — गोदावरी तट की परंपरा
गोदावरी नदी के तट पर स्थित रामकुंड धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है और यहां पितृकर्म की परंपरा रही है।
9. ब्रह्मकपाल, बद्रीनाथ — हिमालय में पितृकर्म
बद्रीनाथ धाम के निकट ब्रह्मकपाल को पिंडदान और श्राद्ध के महत्वपूर्ण स्थलों में माना जाता है।
10. कुरुक्षेत्र, हरियाणा — पवित्र सरोवरों में तर्पण
महाभारत और गीता की भूमि कुरुक्षेत्र में भी पितरों के निमित्त तर्पण और श्राद्ध की परंपरा रही है।
कहीं फल्गु के तट पर पिंड अर्पित किए जाते हैं, कहीं गंगा की धारा में तर्पण होता है और कहीं पवित्र सरोवरों के किनारे पूर्वजों का स्मरण। विधियां अलग हो सकती हैं, लेकिन भावना एक ही है—अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता।
हमारे पूर्वज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके संस्कार हमारे भीतर जीवित हैं। उन्होंने जो जीवन-मूल्य हमें दिए, वही हमारी वास्तविक विरासत हैं। जिस जड़ ने हमें खड़ा किया, उसे याद रखना संस्कार है; और उस संस्कार को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना ही सच्चा पितृ तर्पण है। पितृपक्ष केवल अतीत को याद करने का पर्व नहीं, बल्कि अतीत से शक्ति लेकर भविष्य को संस्कारवान बनाने का संकल्प है।







