राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
धुंधला चश्मा और साफ दुनिया
(कहानी)
*************
राज बाबू को पूरे मोहल्ले और दफ्तर में ‘सबका हितैषी’ कहा जाता था। स्वभाव ऐसा कि किसी का दुख देखा नहीं कि खुद मदद के लिए खड़े हो गए। सरकारी नौकरी में रहते हुए उन्होंने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा और न ही कभी अपने पद का घमंड किया। लेकिन समय का चक्र घूमता है, और एक दिन राज बाबू भी अपनी लंबी सरकारी सेवा से निवृत्त (रिटायर) हो गए।
विदाई की शाम ढली, दफ्तर के फूल-मालाएं मुरझाए और राज बाबू अपने घर के भीतर सिमट गए। रिटायरमेंट के ठीक बाद ही उनकी सेहत ने करवट ली। दोनो आँखों में मोतियाबिंद इस कदर बढ़ गया कि सामने की चीजें धुंधली तस्वीरें बन गईं। घर की सीढ़ियों से उतरना उनके लिए एक खतरनाक सफर जैसा हो गया, जहाँ हर कदम फूंक-फूंक कर रखना पड़ता था। एक दिन तो हद हो गई जब वे वॉशरुम में पैर फिसलने के कारण बुरी तरह गिर पड़े। गनीमत थी कि कोई गंभीर चोट नहीं आई, लेकिन उनका आत्मविश्वास पूरी तरह डगमगा गया। जो राज बाबू कभी स्कूटर पर सवार होकर पूरे शहर की दौड़ लगा लेते थे, अब उनके लिए वाहन चलाना तो दूर, सड़क पार करना भी एक दुरूह (कठिन) कार्य बन गया था।
शारीरिक लाचारी के बीच एक अजीब सी मानसिक शांति भी थी। राज बाबू के मन में एक वैराग्य सा आने लगा था। वे अक्सर सोचते कि अच्छा ही है जो आँखें धुंधली हो गई हैं। वे इस स्वार्थी दुनिया की कड़वी सच्चाई को अपनी इन बूढ़ी आँखों से साफ-साफ नहीं देखना चाहते थे। वे नहीं चाहते थे कि जिन लोगों की उन्होंने जीवन भर मदद की, उनका बदला हुआ रूप देखकर उनका दिल दुखे।
घर के लोग और रिश्तेदार अक्सर उनसे कहते, “बाबू जी, अब उम्र हो गई है। अब आप आराम करिए, आराम से सोफे पर बैठिए और टीवी देखिए।” लेकिन कहने वाले नहीं जानते थे कि राज बाबू के लिए टीवी देखना भी एक सजा जैसा था। टीवी स्क्रीन पर उभरते चित्र उन्हें धुंधले दिखाई देते और नीचे चलने वाले समाचारों के टाइटल्स को पढ़ने के लिए उन्हें आँखों को बहुत ज्यादा मीचना पड़ता था, जिससे उनके सिर में तेज दर्द होने लगता।
एक दिन पत्नी और बच्चों के बार-बार टोकने और जिद करने पर राज बाबू ने शहर के एक बड़े नेत्र चिकित्सक (आई स्पेशलिस्ट) को अपनी आँखें दिखाईं। डॉक्टर ने आँखों की जांच की और कहा, “अभी मोतियाबिंद पूरी तरह पका नहीं है। मैं चश्मे का नंबर बदल देता हूँ, आप इसे लगाइए और छह महीने बाद मुझे फिर से दिखाइयेगा।
राज बाबू नया चश्मा बनवाकर घर आ गए। छह महीने बीत गए, लेकिन उस चश्मे से उनकी जिंदगी में कोई रोशनी नहीं आई। धुंधलापन जस का तस बना रहा और दुनिया वैसी ही रहस्यमयी और अस्पष्ट दिखती रही। इस बीच, उन्हें समझ आ गया कि केवल चश्मे का नंबर बदलने से आंतरिक और बाहरी धुंध साफ नहीं होगी।
आखिरकार, छह महीने पूरे होने पर उन्होंने एक बड़ा फैसला लिया। सरकारी सेवा से निवृत्ति के समय जो फंड और ग्रेच्युटी का पैसा उन्हें मिला था, राज बाबू ने तय किया कि वे उस धन का सही उपयोग करेंगे। उन्होंने डॉक्टर से दोबारा संपर्क किया और अपनी दोनों आँखों के मोतियाबिंद का ऑपरेशन करवा लिया।
ऑपरेशन के कुछ दिनों बाद जब आँखों से पट्टियाँ हटाई गईं, तो राज बाबू की जिंदगी में एक चमत्कार हो चुका था। बिना किसी चश्मे के, उनकी आँखों के सामने की दुनिया एकदम कांच की तरह साफ थी।
अब राज बाबू के सामने एक बिल्कुल नया अनुभव था। चश्मा हट चुका था और वे बिना किसी सहारे के सारी दुनिया को देख पा रहे थे। इसके साथ ही, वे लोगों का असली चेहरा भी देख रहे थे। पूरे आत्म विश्वास से अपना वाहन चलाने लगे तो खुशी से फूले नहीं समा रहे थे। साथ ही वे देख रहे थे कि कौन सचमुच उनका आदर करता है और कौन केवल उनके पद और पैसे का सगा था। लेकिन इस बार, दुनिया का यह असली चेहरा देखकर वे दुखी नहीं हुए, बल्कि उनके भीतर एक अजीब सी परिपक्वता और सहजता आ गई थी। धुंधलेपन के डर ने उन्हें कमजोर बनाया था, पर इस नई और साफ दृष्टि ने उन्हें अंदर से मजबूत कर दिया था।
एक शाम, राज बाबू अपने घर की छत पर गए। उन्होंने ऊपर देखा गहरा नीला ,खुला आकाश दूर तक फैला हुआ था, जिसमें शाम के तारे टिमटिमा रहे थे। इस अनंत ब्रह्मांड की विशालता और सुंदरता को देखकर उनका हृदय भर आया। उन्होंने अपनी दोनों आँखें बंद कीं, दोनों हाथ ऊपर उठाकर अन्तरिक्ष के हाथ जोड़े और पूरे मन (मस्तिष्क और आत्मा) से उस अलौकिक शक्ति/ ब्रह्मांड को धन्यवाद दिया।
राज को समझ आ गया था कि ईश्वर ने उन्हें न केवल आँखों की रोशनी लौटाई थी, बल्कि जीवन को उसकी पूरी सच्चाई, अच्छाई और बुराई के साथ स्वीकार करने की एक नई अंतर्दृष्टि भी दे दी थी। अब वे एक आज़ाद और संतुष्ट व्यक्ति थे, जो बिना किसी चश्मे के, दुनिया के रंगमंच को मुस्कुराते हुए देख रहे थे।
हरेक व्यक्ति के जीवन में शारीरिक मानसिक और आर्थिक और कभी कभी सामाजिक परेशानियां, उम्र, परिस्थिति और स्थान परिवर्तन से होती हैं,इन परेशानियों से बचने के लिए युक्ति- युक्त तरीके से अपने बुद्धि विवेक से वरिष्ठ नागरिकों हारने की वजह जीतने की कोशिश करना चाहिए।







