डा. सुधाकर आशावादी
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
व्यंग्य
कम समय में पॉपुलर होने के आसान नुस्खे
बहुत समय पहले एक फिल्म आई थी, जिसका गाना था – छोटी सी उमर में लग गया रोग, कहते हैं लोग मैं मर जाऊँगी। गाने में कौन से रोग का जिक्र था, वह उस समय का रोग था, वर्तमान में बेरोजगार किशोर किशोरियों को नया रोग लगा है, वह रोग उनके पॉपुलर होने का मार्ग भी प्रशस्त करता है और कमाई का भी। कभी कभी यह रोग इतना बढ़ जाता है, कि पूरे करियर पर ही ग्रहण लगाने की स्थिति में आ जाता है।
एक समय था कि जब लाभ हानि जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ हुआ करता था। अब संचार क्रांति का युग है। पॉपुलर होने के लिए पूरी योजनानुसार ऐसी स्क्रिप्ट तैयार करनी होती है, जो चर्चा का विषय बने। स्क्रिप्ट से आहत होकर कुछ विरोध के स्वर उठने लगे, कुछ स्क्रिप्ट के समर्थन में सुर मिलाने लगें। देखते ही देखते दो तीन बार स्क्रिप्ट की श्रृंखला को आगे बढ़ाओ और पॉपुलर हो जाओ। वैसे इस खेल में जोखिम भी कम नहीं है लेकिन जोखिम के प्रतिशत में अंतर है। जोखिम पोस्ट कर्ता की जाति पर अधिक आधारित है। वैसे भी यदि पोस्टकर्ता पुरुष है, तो उसके लिए जोखिम अधिक है और यदि पोस्टकर्ता किसी जाति विशेष से जुड़ी महिला है या किशोरावस्था में कदम रखने वाली किशोरी है, तो उसके लिए कम।
कटु सत्य तो यह भी है कि खुद को बच्ची घोषित करने वाली किशोरियाँ किसी भी प्रकार के कानूनी पचड़े से मुक्त रहती हैं। वे जिसे चाहे माँ बहन की गाली दे सकती हैं। उन्हें सभ्य घरों की किशोरियों की तरह किसी अनुशासन और नैतिक मर्यादाओं के बंधन में बंधकर नहीं रहना पड़ता। वे सभ्यता की सीमा में रहने वाले परिधानों से मुक्त अधोवस्त्रों में सार्वजनिक मंचों पर नई नई गालियों का अभिनय सहित उच्चारण कर सकती हैं। यह उनका विशेषाधिकार होता है। यदि कोई उनके किसी कंटेंट के प्रति आक्रोश व्यक्त करे, तो उनकी पीठ पर सहानुभूति रखने वाले विपक्षियों के हाथ मजबूती से सवार रहते हैं।
बहरहाल जमाना बदल गया है। युग उनके साथ हैं, जो पढ़ने की उम्र में स्कूल कॉलेज की जगह सड़कों पर अपना चाल, चरित्र और चेहरा प्रदर्शित करने से परहेज नहीं करता। उच्च शिक्षित समाज सुधारक या बुद्धिजीवी चाहे कितनी ही सारगर्भित पोस्ट सोशल मीडिया पर परोस दें, किंतु उनकी पोस्ट पर लाइक और शेयर की संख्या दहाई का आंकड़ा स्पर्श करने के लिए भी तरसती है, वहीं गालीबाज बच्चियों के वीडियो की लाइक और शेयर उन्हें रातोंरात सेलिब्रिटी बना देते हैं।
सीधी सी बात है कि महिला या किशोरी होना ही यूट्यूबर के लिए लाभ का सौदा होता है। उनके चहेतों के साथ उनकी आर्थिक सहायता करने वालों की संख्या भी बढ़ जाती है। अब हालात ऐसे हैं कि किसी भी पुरुष यूट्यूबर के कुछ भी बोलने पर उसके सर पर गिरफ्तारी की तलवार लटक जाती है। वह लाख चिल्लाता फिरे कि उसकी बात शत प्रतिशत सत्य है, उसमें कोई तथ्य छिपाया गया या झूठ नहीं है, लेकिन उसकी आवाज़ नक्कारखाने में तूती बन कर रह जाती है। उसके विपरीत किसी बच्ची या महिला यूट्यूबर चाहे सेना के संवेदनशील मुद्दों पर राष्ट्र विरोधी वीडियो बनाए, किसी प्रधानमंत्री के विरुद्ध अपमानजनक टिप्पणी करे या किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति के विरोध में अराजकता फैलाने वाले कंटेंट प्रसारित करें, तब उसका बाल भी बाँका नहीं होता, उसके बचाव में महंगे रेट वाले वकील भी बिना फीस के अदालत में खड़े होने में देर नहीं लगाते। इसी के चलते उसकी पॉपुलैरिटी उसकी आय का ज़रिया बन जाती है। उसके परिवार का गुजारा उनकी पॉपुलैरिटी से ही चलने लगता है। निष्कर्ष यही निकलता है कि नंग बड़े परमेश्वर से।
कलियुग की खासियत है कि झूठों का बोलबाला सच्चों का मुँह काला। कहीं कोई अबोध बालिका किसी मुखिया की तेरहवीं पर समोसे बाँट कर इतनी पॉपुलर हो जाती है कि उसके परिवार को बिना किसी काम के रोजगार मिल जाता है। बाप बेटी की कमाई बढ़ जाती है। खाते में फंडिंग बढ़ जाती है। अबोध बालिका की उम्र का कोई सर्टिफिकेट नहीं माँगता। उसकी उम्र एक ख़ास अंक पर रुकी रहती है। उसे किसी की आस्था से खिलवाड़ करने की पूरी आज़ादी मिली रहती है। उसका बाप चाहे किसी पर भी कोई मुकदमा दर्ज करवा सकता है, जेल भिजवा सकता है, मगर उसके बाप को कोई ऐसा बाप नहीं मिलता, जो जेल भिजवा सके क्योंकि इसके पीछे भी अबोध बालिका की पॉपुलैरिटी की भूमिका अधिक रहती है।
(विनायक फीचर्स)







