संसार की निष्ठुरता में कोमल हृदय

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दार्शनिक सूर्य जी

 

 

                 (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)                                                (w) 6395080071

   

                             लेख:

          संसार की निष्ठुरता में कोमल हृदय

 

”चुपचाप चलते रहना ही जीवन है!”

”हितकारी बनो, 

हितैषी बनो मनुष्यों रे!

तुम्हारी आतुरता, 

तुम्हारे अति-चिंतन की ही देन है।”

 

 

                यह संसार जितना सुंदर दिखता है, उतना ही कठोर भी है। यहाँ अमानवीयता है, अत्याचार है, और सबसे बड़ा छल यह है कि सज्जनता को ही कमजोरी कह दिया गया है। मैंने जीवन भर इस प्रचलित सोच पर प्रश्न उठाए हैं। क्योंकि मेरा दृढ़ मत है, जो मन सबके कल्याण की कामना करता है, वही मनुष्य का सबसे शुद्ध रूप है।

 

          हितैषी और सज्जन बने रहना कोई कमजोरी नहीं, बल्कि एक प्रकार का तप है। इस अमानवीय और भीषण संसार में भी सबकी भलाई करना और सबकी भलाई चाहना, यही सबसे बड़ी बात है। और इसी राह पर चलते हुए यह भी समझा कि जीवन में जिज्ञासु बने रहना अच्छा और आवश्यक है, पर जिज्ञासा संतुलित होनी चाहिए। निरंतर सीखने की ललक रहे, पर अति न हो, क्योंकि अति से मानसिक शांति भंग होती है।

 

             मनुष्य के अंतस में जब-जब आतुरता होती है, तो वह अधिक चिंतन के कारण ही होती है। अधिक सोचना ही मनुष्य को निर्बल बनाता आया है। इसलिए अपने सही पथ पर बढ़ते रहना, अपने तरीके से जीना और बीच-बीच में रुक कर अपने अंतर्मन को सुनना ही श्रेयस्कर है।

 

                     इसे मनुष्यों को समझना होगा, विशेषकर जो वास्तव में संवेदनशील हृदय के हैं कि बाहरी कोलाहल से बड़ा कोई शत्रु नहीं होता। संसार में कठोरता अधिक है और मानवता की कमी है, इसे बनाए रखने की आवश्यकता है। जब अत्यधिक चिंतन मन को बोझिल कर दे, तब क्षण भर रुक कर स्वयं को सुनना चाहिए। सब कुछ संभव है। अपनी संवेदनशीलता, नम्रता तथा सज्जनता को निरंतर बनाए रखिए। मेरा ऐसा मानना है कि मनुष्य का मूल्य उसके ज्ञान से नहीं, उसके कर्म से है। अपने पथ पर निष्काम भाव से चलते रहना ही जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता है, और यह सार्थकता चुपचाप लगे रहने में है, भीड़-भाड़ से बचकर।

 

 

(यह लेख पूर्णतः दार्शनिक है। इसके रचयिता ‘सूर्य जी’ भारतीय संस्कृति के संरक्षक, समरसता के प्रतीक, आध्यात्मिक चिंतक, महनीय दार्शनिक, साहित्यकार, मानवतावादी एवं समाज-सुधारक हैं।)

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