संजय सोंधी (संयुक्त निदेशक) शिक्षा निदेशालय दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
गुटनिरपेक्षता से बहु-संलग्नता: नए भू-राजनीतिक परिदृश्य में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और आर्थिक आत्मनिर्भरता।
समकालीन वैश्विक भू-राजनीति एक अभूतपूर्व परिवर्तन के दौर से गुजर रही है, जहाँ शीतयुद्धकालीन और उत्तर-शीतयुद्धकालीन पुराने समीकरण पूरी तरह से अप्रासंगिक हो चुके हैं। पिछले कुछ दशकों में महाशक्तियों के बीच बदलती साठगांठ ने यह साबित कर दिया है कि अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में कोई भी व्यवस्था स्थायी नहीं होती। पहले अमेरिका और चीन के बीच जी-2 के तहत रणनीतिक व आर्थिक बातचीत हुई, वहीं अब बदलती प्राथमिकताओं के बीच अमेरिका और रूस के बीच एक नया जी-2 आकार लेता दिख रहा है। इन तीनों देशों ने बिना किसी वैचारिक प्रतिबद्धता के केवल अपने-अपने फ़ायदे के लिए आपस में समझौते कर लिए हैं। इस यथार्थवादी माहौल ने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के उस कठोर सत्य को उजागर कर दिया है कि आज की दुनिया में नैतिकता और सिद्धांतों नाम की कोई चीज नहीं बची है।
इस तेज़ी से बदलते परिदृश्य में भारत के लिए सबसे बड़ा सबक यही है कि वह अपनी पारंपरिक सैद्धांतिक नीतियों और अमूर्त नैतिकता को छोड़कर केवल एक ही ध्येय पर ध्यान केंद्रित करे—राष्ट्रीय हित। भारत के लिए किसी भी स्थिति में किसी एक गुट में शामिल न होना अनिवार्य है, चाहे वह अमेरिका हो, रूस हो या चीन। भारत को हमेशा अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) बनाए रखनी होगी और अपनी विदेश नीति में उच्च स्तर की लचक और गतिशीलता रखनी होगी, ताकि समय और परिस्थितियों के हिसाब से नीतियों में तुरंत बदलाव किया जा सके।
हालांकि, इस रणनीतिक स्वायत्तता को वास्तविक अर्थों में हासिल करने के लिए भारत को अपनी आंतरिक मजबूरियों और कमज़ोरियों को दूर करना होगा। वर्तमान में भारत ऊर्जा सुरक्षा के मामले में अत्यधिक संवेदनशील स्थिति में रहता है, क्योंकि अपनी कच्चे तेल की 85% से अधिक आवश्यकताओं के लिए वह आयात पर निर्भर है। इस जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuel) पर निर्भरता के कारण वैश्विक संकटों के समय भारत पर भारी दबाव बनता है। इस मजबूरी को खत्म करने के लिए भारत को सौर ऊर्जा (Solar Energy), पवन ऊर्जा (Wind Energy) और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे नवीकरणीय स्रोतों की ओर तेज़ी से रुख़ करना होगा। जब तक भारत अपनी ऊर्जा आत्मनिर्भरता हासिल नहीं कर लेता, तब तक उसकी रणनीतिक स्वायत्तता हमेशा बाहरी भू-राजनीतिक झटकों के प्रति संवेदनशील बनी रहेगी।
इसके साथ ही, भारत को वैश्विक स्तर पर एक मजबूत विनिर्माण केंद्र (Manufacturing Hub) के रूप में उभरना अत्यंत आवश्यक है। केवल सेवा क्षेत्र के भरोसे भारत अपनी 140 करोड़ से अधिक की आबादी के लिए पर्याप्त रोज़गार के अवसर पैदा नहीं कर सकता। एक उन्नत और शक्तिशाली राष्ट्र बनने के लिए भारत को इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन, ऑटोमोबाइल और भारी उद्योगों में एक वैश्विक विनिर्माण शक्ति बनना होगा। एक विशाल मैन्युफैक्चरिंग बेस न केवल देश में बड़े पैमाने पर रोज़गार सृजित करेगा, बल्कि भारत को एक अजेय आर्थिक शक्ति बनाकर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में उसकी स्थिति को अनिवार्य बना देगा। ऊर्जा सुरक्षा और मजबूत औद्योगिक आधार ही भारत को किसी भी महाशक्ति के दबाव से मुक्त रखकर उसकी स्वायत्त और यथार्थवादी विदेश नीति को असली ताकत प्रदान करेंगे।






