राजेन्द्र रंजन गायकवाड (सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक) बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
कर्मफल (भाग 15)
राजन ने सुना था कि प्यार में भरोसा सबसे जरूरी चीज होती है। बिना भरोसे के प्यार सिर्फ एक ख़ूबसूरत सपना बनकर रह जाता है, जो हक़ीक़त में जागने पर बिखर जाता है। मोना की खूबसूरती के दीवाने मुहल्ले में कई थे। कोई उसके गोल-मटोल चेहरे पर, कोई उसकी काली घनी आँखों पर, कोई उसकी मुस्कान पर फिदा था। लड़के रास्ते में खड़े होकर उसके जाने का इंतज़ार करते, स्कूल के गेट पर इकट्ठे हो जाते। लेकिन मोना का दिल और दिमाग दोनों कहीं और टिके हुए थे,राजन की सादगी पर, उसकी पढ़ाई की लगन पर और उन छोटी-छोटी बातों पर जो वह कभी-कभी वो उससे कहता और कुछ फ़िल्मों के गीत लिखकर देता था।
राजन सुंदर तो था, पर गरीब ज्यादा, उसके पास सिर्फ एक पुरानी साइकिल थी, फटी किताबें थीं और घर की तंगहाली का बोझ था। लेकिन जब वह पढ़ता था तो उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ जाती थी। मोना उसी चमक को देखती थी। वह सोचती थी यह लड़का शायद कुछ कर जाएगा और एक दिन बड़ा आदमी बनेगा।
मोना के फेल हो जाने से घर में तूफान आ गया, माँ ने गुस्से में सारी किताबें फेंक दीं और कहा “पढ़ाई करके क्या करना है? लड़की होकर फेल हो गई, अब और पढ़ने की ज़रूरत नहीं। नर्सिंग सीख ले, कुछ कमाने लायक बन जाएगी।फिर कुछ दिनों बाद मोना को इंदौर नर्सिंग कोर्स के लिए भेज दिया। राजन को पता ही नहीं चला जब वह दो-एक बार उसके घर गया, तो माँ ने साफ कह दिया “मोना किसी रिश्तेदार के घर गई है, पता नहीं कब आएगी।
राजन बाहर खड़ा, साइकिल का हैंडल पकड़े हुए सुन रहा था अंदर से आवाज़ आ रही थी कि दरवाजा बंद कर दिया गया है। उसने समझ लिया। घर वाले नहीं चाहते कि वह मोना से मिले न आज, न कभी। इसलिए चुपचाप उधर आ गया। शाम को शाहिद राजन के घर तिली अपनी साइकिल से आया शाहिद ने एक बीड़ी सुलगाई और धीरे से बोला- यार सुन! अब भूल जाना है, ठीक है? उसे तुझे लंबी मंजिल पार करनी है। घर के हालत भी ठीक नहीं और दूसरी बात… वो मसीह समाज वाले तुझसे कभी शादी नहीं करेंगे फिर तू खुद सोच ले।
राजन चुप चाप सुन रहा है और समझ रहा कि शाहिद की बातें सही हैं। वह जानता था लेकिन जानना और मानना दो अलग चीजें होती हैं। बहुत सी बातें जानकर मानी नहीं जाती और नतीज़ा,, अनमोल आंसू,,कुछ देर बाद शाहिद अपने घर लौट गया। उस दिन राजन ने खाना भी नहीं खाया था, वह पहली बार बुरी तरह ऐसे टूटा था कि लड़खड़ा कर गिर जाएगा।
गरीबी ने उसे कभी नहीं तोड़ा था। घर की तंगहाली, माँ-बाप की बीमारी, छोटे भाई-बहनों की परेशानियाँ सब सह ली थीं। लेकिन आज कुछ और टूटा था। वह अपनी साइकिल लेकर पहाड़ी के नीचे, सड़क के किनारे साइकिल पटक कर खड़ा हो गया। सामने एक पुराना बरगद का पेड़ था। उसने उस पेड़ से लिपट कर रोना शुरू कर दिया, आँसू ऐसे बह रहे थे जैसे सालों से रुके सैलाब का सब्र टूट गया हो। बरगद की मोटी जड़ें उसके सीने से चिपक कर थपकी दे रहीं और हवा में पत्ते हिल रहे थे। रात के अंधेरे में कोई नहीं देख रहा था कि एक लड़का पेड़ से लिपटा हुआ काँप रहा है, जिसकी सांसों की आवाज़ खुला-आकाश सुन रहा है
उस रोने में सिर्फ मोना और उसका टूटा प्यार नहीं था, उसमें अपनी औकात और समाज की ऊंची दीवारों का अहसास था और इस कड़वी सच्चाई का गहरा अहसास कि कुछ रिश्ते सिर्फ इसलिए नहीं हो पाते क्योंकि वे “होने” वाले होते नहीं,, महज चंद रोज़ का छलावा होते हैं। राजन उस रात बहुत देर तक रोया फिर चुपचाप साइकिल उठाई और घर की तरफ चला गया। आँखें सूजी हुई थीं, लेकिन मन में एक अजीब सी सन्नटा छा गया था।
शायद कर्मफल यही होता है किसी को प्यार मिल जाता है, किसी को सिर्फ उसकी याद और याद भी धीरे-धीरे एक बोझ बन जाती है, जिसे आदमी जिंदगी भर ढोता रहता है। कभी हंसके कभी रो -रो के ,, हां,, बिरहा गीत गाकर भी दिल को तसल्ली दी जाती है।
(आगे की सच्चाई कल)








