मनोज शाह मानस
नारायण गांव,
नई दिल्ली
“प्यार के बीज…”
बाढ़ ने बहाकर ले गए…,
बस्ती… बस्ती
मौजों की कश्ती
बहार और मस्ती…!
कोई भगवान को
कोई भाग्य को
कोई सरकार को
दोष लगाते हैं…!
नदियों ने नहीं दबाया है
नासमझ इंसानों ने
दबा रखा था…,
बाढ़ ने वापस ले लिया…!
क्यों ये इंसान
इतना नासमझ हैं…?
इतना करने के बाद भी
वह कुछ सिख
ता नहीं है
मांगने वाली मुद्रा में
हाथ उठाकर नदियों से
अपनी घर घराड़ी
मांगता रहता है…!
प्यार के बीज रोपोगे तो
प्यार ही उगेगा…,
स्वार्थ रोपोगे और
कहोगे कि…,
प्यार फला फुला नहीं…!








