“जीवंत इंसानियत”         (कविता)

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सुश्री सरोज कंसारी

कवयित्री/लेखिका/अध्यापिका

अध्यक्ष: दुर्गा शक्ति समिति,

गोबरा नवापारा-राजिम,

रायपुर, (छत्तीसगढ़)

 

                        (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

               “जीवंत इंसानियत”

                       (कविता)

 

 

 

संवेदनाएँ दम तोड़ रही हैं,

कहते हैं,

समय के बाजार में

दया का मोल नहीं रहा,

धर्म बिक गया,

करुणा थक गई,

स्नेह हिसाब मांगने लगा।

 

और वास्तविकता भी यही है,

अव्यवस्था रोज अखबार बनती है,

अपराध आदत हो गया है,

हिंसा, आतंक, खून-खराबा

जीवन के साथ चलने लगे हैं,

इनका कोई छोर नहीं दिखता।

 

इसलिए, 

इंसानियत को मत भूलना,

इंसानियत को जीवंत रखना होगा।

 

  

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