मानौरा: जहां पुरी से वचन निभाने आते हैं भगवान जगदीश

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अंजनी सक्सेना

 

 

                 (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

 

मानौरा: जहां पुरी से वचन निभाने आते हैं भगवान जगदीश

 

 

आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष द्वितीया। इस दिन पूरे देश में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का जयघोष गूंजता है। उड़ीसा की पुरी में जब लाखों भक्तों के कंधों पर भगवान का रथ आगे बढ़ता है, तब मध्यप्रदेश के विदिशा जिले का एक छोटा सा गांव मानौरा सांसें थामे एक चमत्कार की प्रतीक्षा करता है। यहां रथयात्रा तब तक शुरू नहीं होती जब तक पुरी में भगवान जगन्नाथ के रथ के पहिए थम न जाएं।

पिछले लगभग 200 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा मानौरा को देश के अन्य धामों से बिल्कुल अलग करती है। कहते हैं संचार के साधन न होने के बावजूद भी पूर्वजों को पता चल जाता था कि अब पुरी में रथ रुक गया है, अब भगवान मानौरा पधार रहे हैं।

स्वयंभू विग्रह और वचन की डोर

 

मानौरा में भगवान जगन्नाथ को जगदीश कहा जाता है। यहां भगवान जगदीश, बलभद्र और देवी सुभद्रा का 200 वर्ष पुराना मंदिर है। चंदन की बनी ये तीनों मूर्तियां स्वयंभू हैं। मान्यता है कि ये स्वयं प्रकट हुई थीं। यहां भी पुरी की तरह मीठे भात का भोग लगता है और वही विधि-विधान से पूजा होती है।

इस अनोखी परंपरा के पीछे एक भक्त की अटूट आस्था की कथा जुड़ी है। वर्षों पहले मानौरा के तरफदार मानिकचंद रघुवंशी और उनकी पत्नी पद्मावती निसंतान थे। जगदीश में उनकी गहरी श्रद्धा थी। संतान की कामना लेकर दोनों पति-पत्नी ने मानौरा से पुरी तक दंडवत यात्रा करने का संकल्प लिया। दुर्गम जंगलों और कांटों भरे रास्तों पर चलते-चलते जब उनका शरीर लहूलुहान हो गया, तब भगवान जगन्नाथ स्वयं प्रकट हुए। उन्होंने भक्तों को वापस मानौरा लौटने और हर वर्ष आषाढ़ दूज पर स्वयं दर्शन देने का वचन दिया। उसी समय मानौरा में तीनों विग्रह भी प्रकट हुए। तब से यह मान्यता है कि वचन निभाने के लिए भगवान पुरी से मानौरा आते हैं।

जब अपने आप खुलते हैं पट

 

रथयात्रा की पूर्व संध्या पर मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं लेकिन रथयात्रा वाले दिन सुबह पट अपने आप खुले मिलते हैं। जैसे ही भगवान को रथ में विराजमान किया जाता है, रथ में हल्का कंपन होता है या वह स्वयं लुढ़कने लगता है। ठीक उसी समय पुरी में पुजारी घोषणा करते हैं – “भगवान मानौरा पधार गए हैं।”

 

इस दिव्य क्षण को देखने मानौरा में हर साल लाखों श्रद्धालु जुटते हैं। चारों ओर सिर्फ एक ही आवाज गूंजती है “जय जगदीश”। यहां मेहमानों का अभिवादन भी “जय जगदीश” से ही होता है।

कीचड़ में भीगी श्रद्धा 

 

रथयात्रा के दिन मंदिर में अटका यानी मीठे भात का विशेष भोग लगाया जाता है। दूर-दूर से आए श्रद्धालु मन्नत पूरी होने पर यह भोग चढ़ाते हैं। सबसे अद्भुत दृश्य तब दिखता है जब आसपास के सैकड़ों गांवों से लोग कीचड़, पत्थरों और कंकड़ों से भरे रास्तों पर नंगे पैर या दंडवत करते हुए मानौरा पहुंचते हैं। उन्हें न भूख की परवाह होती है, न थकान की। उनकी आंखों में सिर्फ एक ही धुन होती है,भगवान जगदीश के दर्शन की।

पुरी के बाद मानौरा में निकलने वाली यह रथयात्रा सिर्फ एक उत्सव नहीं है। यह एक वचन की निरंतरता है, एक भरोसे की गवाही है कि आस्था के आगे समय और दूरी दोनों छोटे पड़ जाते हैं। जब तक पुरी में रथ रुकेगा, तब तक मानौरा में जगदीश का रथ चलता रहेगा।   (विभूति फीचर्स)

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