समाज सुधार के दो दीप ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले

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आरती चौगुले

 

              (नया अध्याय, देहरादून)

 

समाज सुधार के दो दीप ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले

 

 

महात्मा ज्योतिराव फुले व सावित्रीबाई फुले इन नामों से कोई भी अपरिचित नहीं है। संपूर्ण विश्व में विशेषतः महाराष्ट्र में यह पति-पत्नी पूजनीय है। सावित्रीबाई फुले भारत की प्रथम शिक्षिका के रूप में पहचानी जाती है। पिछड़े हुए रूढ़िवादी, अंधश्रद्धा, छुआछूत,जातिभेद आदि बुराइयों, कुरीतियों से ग्रसित समाज में, इन्होंने क्रांति की मशाल जलाई और समाज को एक नई दिशा देकर अजर अमर हो गये।

ज्योतिबा का जन्म 11 अप्रैल 1827 को कटगुण सातारा में एक रूढ़िवादी पिछड़े हुए माली परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम गोविंदराव व माता का नाम चिमणाबाई था। इनके बड़े भाई का नाम राजाराम था। पिता का एक बाग था और वे फूल बेचने का कार्य करते थे, इसलिये इनका उपनाम फुले पड़ गया। छोटी आयु में ही इनकी माता का देहान्त हो गया, और सगुणाबाई-क्षीरसागर नाम की मौसेरी बहन ने इनका लालन-पालन किया।

बचपन से ही ज्योतिबा कुशाग्र बुद्धि थे। शिक्षा के प्रति रुझान था। पढने में रूचि थी। इनकी प्रतिभा देखकर, इनके पिता ने विद्यालय में दाखिला करवा दिया। कक्षा में वह मेधावी छात्रों में से थे। उस समय निम्न जाति के लोगों को और स्त्रियों को शिक्षा के अधिकार से वंचित रखा जाता था। इसी कारण कुछ लोगों ने गोविंदराव को फुसलाना शुरू किया, कहते ‘ज्योतिबा’ को पढ़ा-लिखा कर क्या करोगे? करना तो उसको बगीचा, खेती की देखभाल और उसका पारिवारिक फूल बेचने का व्यवसाय ही है।

फलस्वरूप उनके पिता ने उनको विद्यालय से निकाल लिया और खेती के कामों में लगा दिया, लेकिन ज्योतिबा के मन में पढ़ने की तीव्र लालसा थी। वे खेत में ही वृक्ष के नीचे बैठकर मिट्टी में अक्षर लिखते रहते थे। तीन वर्ष इसी तरह बीतने के पश्चात ‘स्कॉट इंग्लिश मीडियम स्कूल में ज्योतिबा ने पुनः विद्यार्जन प्रारंभ किया। उस समय समाज में एक और कुप्रथा थी ‘बाल-विवाह । कुल तेरह वर्ष की आयु में ज्योतिबा का विवाह नौ वर्ष की सावित्री के साथ हो गया। सावित्री सातारा जिले में नायगाँव की रहनेवाली भोली-भाली निर्भीक और चंचल बालिका थी। इनके पिता का नाम खंडोजी नेवसे पाटिल था।

सहेलियों के साथ पेड़ पर चढकर बेर-इमली तोड़ना, भाँति-भाँति के खेल खेलना यही उसकी दिनचर्या थी। किसी भी प्रकार का अन्याय वह सहन नहीं करती थी। अन्याय होते हुए देख भी नहीं सकती थी। उस समय समाज में स्त्रियों की स्थिति दयनीय थी। स्त्रियों को शिक्षा के अधिकार से वंचित रखा गया था। छोटी उम्र में विवाह, मातृत्व का बोझ, संयुक्त परिवार में दिनभर घर के काम, बच्चों की परवरिश, इतना ही स्त्रियों का दायरा था। यदि कोई लड़की बाल उम्र में ही विधवा हो जाती, तो परिवार और समाज उसका जीना दुश्वार कर देते। अच्छा खाना, अच्छा पहनना तो वह सोच भी नहीं सकती थी। सती प्रथा जैसी कुप्रथाएं समाज में व्याप्त थी। राजा राममोहन राय और केशवचंद्र सेन ने इन कुरीतियों का जमकर विरोध किया।

ज्योतिबा ने भी इन कुप्रथाओं का जमकर विरोध किया और स्त्री शिक्षा का शुभारंभ इन्होंने अपने घर से ही सावित्री को अक्षर-ज्ञान करा के किया। सावित्री भी कुशाग्र बुद्धि की थी। पठन-पाठन में उसकी विशेष रूचि थी। शीघ्र ही उन्होंने शिक्षा को आत्मसात कर लिया था, किंतु यह सब इतना सरल नहीं था। स्त्री शिक्षा के विरोधी समाज ने उन पर अनेकानेक अत्याचार किये। उन पर पत्थर फेंके, गोबर, कीचड़ फेंका, मानसिक यातनाएं दी, फिर भी यह दंपत्ति अपने पथ से विचलित नहीं हुए।

 

शनैः शनैः समाज में कुछ लोग स्त्री शिक्षा का अनुमोदन करने लगे। उनको शिक्षा का महत्व समझ में आने लगा। वे अपने घर की महिलाओं को पढ़ने के लिये विद्यालय में भेजने लगे। सावित्रीबाई, उन स्त्रियों को बहुत प्रेम से, अपनत्व से पढ़ाती थी। इस प्रकार देश की प्रथम शिक्षिका सावित्रीबाई हुई। शिक्षा का प्रसार तीव्र गति से हो रहा था। ज्योतिबा ने (22) बाईस विद्यालय खोले। सत्य-शोधक समाज की स्थापना की। देश में प्रचलित कुरीतियों का विरोध किया। कुरीतियों और अज्ञान के अंधकूपों में पड़े हुए समाज में ज्ञान की ज्योति जलाई और अपने ज्योतिबा नाम को सार्थक किया। सावित्रीबाई, अपने पति के पदचिन्हों पर चलती रही और पति के संपूर्ण कार्यों में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा।

 

एक बार महाराष्ट्र में अकाल पड़ गया तब सावित्रीबाई ने रोज दो हजार भाकरी (ज्वार की रोटी) बनाकर गरीबों को खाना खिलाया। स्वयं के घर का कुआँ, अस्पृश्यों को पानी भरने के लिये खोल दिया। बालहत्या, भ्रूणहत्या जैसे अपराधों को रोका। सारी उम्र इस दंपत्ति ने सामाजिक कार्यों में तन-मन-धन से अपने आप को झौंक दिया। इस सब के लिये उनको अनेक यातनाएं झेलनी पड़ी। धर्म के ठेकेदारों ने उनको अनेक प्रकार से प्रताड़ित किया, यहाँ तक कि ज्योतिबा के पिता ने उनको परिवार से निष्कासित कर दिया। 73 वर्ष की उम्र तक उन्होंने क्रांति की मशाल थामे रखी। गुलामगिरी ज्योतिबा के द्वारा लिखी पहली पुस्तक है। 73 वर्ष की उम्र में पक्षाघात का आक्रमण उन पर हुआ। सावित्रीबाई ने अपने पति की खूब सेवा की। इस दंपत्ति की अपनी कोई संतान नहीं थी। दूसरों के बच्चों पर यह ममतामयी माँ अपनी ममता लुटाती रही। एक अनाथ बच्चे को गोद लेकर डॉक्टर बनाया। ज्योतिबा ने उनकी मृत्यु के समय उनकी अंतिम इच्छा व्यक्त की थी कि उन्हें उनके घर के आँगन में दफन किया जाय। परंतु तत्कालीन सरकार ने उनकी इस इच्छा का विरोध किया, और रीति-रिवाज के अनुसार उनका दाह-संस्कार किया गया।

 

सावित्रीबाई ने पति की अर्थी के आगे चलकर पति की चिता को मुखाग्नि दी। इस तेजोमय नारी को मेरा शतशःवंदन। पति की मृत्यु के पश्चात भी, इन्होने समाजसेवा का जो व्रत लिया था उसे अखंड चालू रखा।

 

1897 में महाराष्ट्र में प्लेग फैला हुआ था। शरीर में किसी स्थान पर गाँठ होती थी और चौबीस घंटे में व्यक्ति मृत्यु के आधीन हो जाता था। एक-एक घर में से चार-चार व्यक्ति मृत्यु के मुख में जा रहे थे। सावित्रिबाई घर-घर में जाकर, प्लेग से पीड़ित लोगों की सेवा सुश्रुषा कर रही थी। उनको स्वयं के प्राणों की तनिक भी परवाह नहीं थी। अपने गोद लिये बेटे यशवंत को जो नागपुर में कार्यरत था, उन्होंने पूना बुला लिया।

 

सावित्रीबाई रोगियों को कंधे पर लादकर अस्पताल पहुँचाया करती थी। ऐसे ही एक बालक को कंधे पर लादकर ले जाते समय रोग का संक्रमण उन्हें हो गया और प्लेग की इस महामारी में, दस मार्च 1897 के दुर्भाग्यशाली दिन ये अनाथों की माँ, लाखों लोगों की श्रद्धास्थान अपनी इहलोक की यात्रा समाप्त कर के अनंत में विलीन हो गयी। वे नायगाँव जैसे ग्रामीण परिवेश में पली-बढ़ी, निरक्षर कन्या थीं जिसके पास अदम्य साहस, धैर्य, निर्भरता और लगन जैसे सद्गुण थे। इन सद्गुणों से अलंकृत सावित्रीबाई को मेरा कोटि-कोटि नमन।

 

आजीवन इस दंपत्ति को समाज ने यातनाएं, त्रास, विवंचना ही दी किंतु उन्होंने स्त्री शिक्षा का जो छोटा सा पौधा लगाया था आज वह वटवृक्ष का रूप ले चुका है।

 

पुणे में आज भी सावित्री बाई फुले विद्यापीठ अस्तित्व में है। उनके घर को महाराष्ट्र सरकार ने संग्रहालय का रूप दिया है। प्रत्येक सफल पुरूष की सफलता के पीछे एक स्त्री होती है। महात्मा ज्योतिराव फुले के कार्यों में उनकी सहधर्मिणी, सहचरी पत्नी का पूर्ण योगदान था। पति-पत्नी दोनों ही एक रूप थे शायद इसलिये इस दांपत्य का समाज के प्रति अमूल्य योगदान है। (विनायक फीचर्स)

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