सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री/ लेखिका/शिक्षिका
अध्यक्ष: दुर्गा शक्ति समिति
गोबरा नवापारा (राजिम)
रायपुर (छ.ग.)
(नया अध्याय, देहरादून)
आलेख:
जीवन की गाड़ी, सुख-दुख के बीच -सुश्री सरोज कंसारी
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आज के समय में इन्सानियत का पतन हो रहा है, और ये देखकर दिल को बहुत दुख होता है। निष्ठुर मनुष्य अपने भीतर की इन्सानियत को भूल रहें हैं, और उनके अंदर नफरत और शत्रुता का जहर भर रहा है। हैवानियत और हिंसा का बोलबाला है, और इन्सान पशु समान व्यवहार कर रहें हैं। दया और करुणा जैसे भाव तो जैसे भूल ही गए हैं। लोग एक दूसरे के प्रति इतने निष्ठुर हो गए हैं कि उन्हें दूसरों का दर्द महसूस ही नहीं होता। इन्सान परेशानियाँ उठाते हैं, मार खाते हैं, और उनकी खुशियाँ छीन ली जाती हैं। ये देखकर अथाह दुख होता है। क्या आपको लगता है कि हम इन्सानियत को फिर से जगाने के लिए कुछ कर सकते हैं? शायद छोटे-छोटे कदम उठाकर, जैसे कि दूसरों की मदद करना, उनके प्रति दया और करुणा दिखाना, हम इस दिशा में कुछ बदलाव ला सकते हैं।
हमें विपरीत परिस्थितियों में भी सकारात्मक रहना चाहिए और अपने मन को मजबूत बनाना चाहिए। मन की गहराई में जाने से असीम शांति मिलती है। सांसारिक जीवन की अनंत वेदनाओं के बीच ही धर्म, अध्यात्म, नैतिकता, मर्यादा और संयम की राह बनाना ज़रूरी है। बिना उद्देश्य के चलने से जीवन अस्त-व्यस्त और उदास हो जाता है। सिर्फ दौड़ते-भागते और उलझते हैं। जितना ध्यान हम मोह-माया में लगाएंगे, उतने ही बिखरते जाएंगे। लेकिन जब हम आत्म-संयम धारण कर लेते हैं, तो आंतरिक शक्ति को प्राप्त करते हैं। दुनिया के इस मेले में भीड़ बहुत है, जहां अक्सर बेचैनी, घुटन और उत्तेजित करने वाले कई कारण मिलते हैं। इसलिए सहज होने के लिए खुद से मिलना ज़रूरी है।
अपने मन में आने वाले हर विचार को बहुत प्यार से देखें, जैसे आप किसी छोटे बच्चे को देखते हैं। उनसे लड़ें नहीं, बस उन्हें स्वीकार कर लें।धीरे-धीरे महसूस करें कि ये विचार आपकी आँखों के सामने धुंधले हो रहे हैं और शांति से गायब होते जा रहे हैं। जैसे ही ये विचार शांत होंगे, आप खुद को अपनी असली स्थिति में पाएंगे—जहाँ सिर्फ शांति, निस्वार्थ प्रेम और गहरा आनंद है। यही आपका असली स्वभाव है।
किसी भी समस्या का समाधान ढूँढने के लिए सबसे पहले उसे समझना ज़रूरी है। जैसे फूल पत्थरों के बीच भी उग आता है, वैसे ही समझदारी से हम मुश्किल हालातों में भी समाधान निकाल सकते हैं। जिसने जैसे कहां वैसे ढल गए, जो मिला उसे धारण कर लिया। सभी का मन रखने के लिए अपना मन मार लिया। अपनी मंज़िल को छोड़कर कहीं और जाकर ठहर गए, इससे ही जीवन बोझिल बन जाती है। खुद को जानना ज़रूरी है, नहीं तो सिर्फ अज्ञान के अंधकार में भय-शोक, संताप और मन कुंठित होता है।
सच्चे और अच्छे मन से सृष्टि की संरचना का स्वागत कीजिए और सकारात्मक रहिए। बुरे विचार से खुशियों पर ग्रहण मत लगाइए। अपने विचार से नए सृजन कीजिए। मनुष्य जीवन सबसे श्रेष्ठ है, उसे हर पल निखारिए ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी के सहयोग से। आत्म-बोध होना हर इंसान के लिए बेहद ज़रूरी है।
अपने शब्दों के तीर से किसी के दिल में चुभन मत बनिए। अपने सुंदर अंदाज से ठहर जाइए मन-मस्तिष्क में, मीठी सी याद बनकर। बहकने से बेहतर है हर परिस्थिति में संभलिए। कलह-बहस और विवादित माहौल से निकलिए और अपने कार्य से कुंठित, दुखी और हीनभाव से ग्रसित लोगों के जीवन को खुशियों से भरने की दिशा में आगे बढ़ते रहिए।
आलोचना से डरिए मत। याद रखिए, जहां कुछ अच्छा करने के लिए कदम उठते हैं, वहीं से विरोध भी शुरू होते हैं। सब कुछ बिना रुकावट के और संघर्ष के हो जाता, तो क्या बात है? वही कर्म-योद्धा बनते हैं जो निडरता से सामना करते हैं हर परेशानियों का। सही परिणाम देकर वहां पर व्याप्त कुरीतियों को दूर कर लोगों की दयनीय स्थिति से बाहर निकालकर जो उन्हें जागृत कर उनके कर्तव्य का बोध कराते हैं, वो सच में महान होते हैं। पद की नहीं, सही कार्य की जय-जयकार होती है।
हर इंसान के मन में बहुत सी बातें होती हैं, जिसे कह नहीं पाते, भले ही घुट-घुटकर जीते हैं। लेकिन कहने का अवसर नहीं मिलता। आज हम किसी की बात सुनकर नहीं, चिंतन नहीं कर पाते, जिससे समस्याएं बढ़ती ही जाती हैं। स्वस्थ मानसिकता रखने की बजाए एक दूसरे के प्रति क्रोध-बैर, ईर्ष्या रखते हैं।
अपने सपने और ख्वाहिश को पूर्ण करने के लिए बहुत संघर्ष करना होता है। इसी के बीच जब हम निस्वार्थ किसी के हित के लिए जुड़ते और मिलते हैं, तो बहुत से अनुभव होते हैं। यही जीवन है – कर्मरत रहना और उत्साह से कार्य करना और जीवन भर सीखते रहना। जिससे मन को खुशी मिले, उसे अवश्य कीजिए।
अगर आप दुनिया को दिखाने, उन्हें अपना बनाने और खुश रखने के लिए कोई प्रयास करते हैं, तो यह बहुत कठिन है, क्योंकि हर किसी की अपनी पसंद-नापसंद और विचार होते हैं। इसलिए जो उचित लगे और हित में हो, वही करें, ज्यादा परिणाम के विषय में चिंतित होकर अपने जीवन को निराश मत कीजिए। समय के अनुसार सब काम होते हैं, किसी की नाराज़गी से व्यथित होकर अपनी गति धीमी मत कीजिए।
जब ठान लिया तो हार मत मानना, जो सत्य है, जिसे करने की आत्मा गवाही दे, उसे अवश्य करना। हम हर किसी की सोच के अनुसार जीवन निर्वहन नहीं कर सकते, जैसे हालात होते हैं, वैसे ही ढलना होता है। इसलिए सोचिए मत, कौन साथ है और कौन नहीं? बस अपने मन, वचन और कर्म से कभी किसी को नुकसान न हो। अपनी जिंदगी के हर फैसले खुद कीजिए, जिससे परिवार, समाज, राष्ट्र का विकास हो, व्यक्तित्व निखरे, आत्म-विश्वास बढ़े, वो करने से कभी घबराएं नहीं।
जब हम खुद से खुद को जान लेते हैं, तब अनंत ऊर्जा प्रस्फुटित होती है। किसी भी क्षेत्र में पूर्ण ज्ञान के अभाव में अक्सर असफलता, निराशा, अपमान और मानसिक प्रताड़ना मिलती है। लेकिन जैसे ही हमें आत्म-बोध होता है, जीवन के अनुकूल एहसास हम करने लगते हैं। हर उलझन से निकलने की क्षमता स्वयं आ जाती है, इसलिए जब भी मन परेशान हो, आत्म-पुकार सुनिए। ध्यान कीजिए, शांत और एकाग्र हो जाइए, दुखी, बेचैन और दुनिया से हारकर कहीं भटकिए मत। बस धैर्य रखिए और जीवन चक्र को स्वीकार कीजिए।
हालात कैसे भी हों..! सहज रहने की कोशिश कीजिए, संभलना भी है और संभालना भी है। ये जिंदगी है, बस, जीने के लिए मजबूत बनना है। सुख-दुख के इस समंदर में डूबते-उबरते जिंदगी की गाड़ी यूं ही चलती रहेगी। और इसी के साथ जीवन के परम सौंदर्य और आनंद को पाने की कोशिश कीजिए।
हमें रीति-रिवाज, नियम-परंपरा, सभ्यता और संस्कृति का सम्मान करना ही पड़ेगा। अपने इस जीवन को अपने अच्छे कर्मों से धन्य कीजिए। छोड़िए ! उन चीजों का पीछा करना जिससे मन में द्वंद्व उत्पन्न होते हैं। तनाव से भरे जीवन की राह होती है, सुखद अनुभव पाने के लिए चलना पड़ता है। दर्द से ही दवा मिलती है। अर्थात जब मन में दूसरों को समझने की प्रवृत्ति जागृत हो जाती है, वही त्याग, समर्पण और खामोश संवाद होते हैं।
जन्म और मरण के खेल में जब हम उलझते हैं, तो सुलझा पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। जाति-धर्म, मजहब के नाम पर लड़ने से सर्वत्र अशांति, अत्याचार और आतंक ही बढ़ते हैं। सबसे पहले हम इंसान हैं, इस नाते हर किसी से अपनेपन का रिश्ता होना ही चाहिए।
मन के शोर को अपना लो,
इसे प्यार से बस सहला लो।
लड़ना छोड़ो, जिद को त्यागो,
सपनों की इस नींद से जागो।
जैसे बादल छँट जाते हैं,
सारे डर भी मिट जाते हैं।
जब विचारों का घेरा टूटेगा,
शांति का झरना फूटेगा।
भीतर जो है, वही है सच्चा,
प्रेम-आनंद का भाव है अच्छा।
मौन में खुद को पा जाओगे,
अपनी असलियत जान जाओगे।
विचारों से लड़ने के बजाय उन्हें प्यार से विदा करना एक बहुत ऊँचा आध्यात्मिक दृष्टिकोण है। विचारों से लड़ो मत, उन्हें बस एक गवाह बनकर देखें…जब आप अपने विचारों को बिना किसी विरोध के, प्यार से स्वीकार कर लेते हैं, तो उनकी शक्ति खत्म हो जाती है। वे बादलों की तरह आते हैं और चले जाते हैं। जैसे ही विचारों का यह शोर शांत होता है, आपके भीतर की असली शांति और खुशी अपने आप बाहर आ जाती है।
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