प्रभारी सम्पादक जौनपुर (यूपी): पंकज सीबी मिश्रा
(राजनीतिक विश्लेषक )
(नया अध्याय, देहरादून)
बिहार में भी ओबीसी दबदबा, तो क्या जातिवादी लॉबिंग करा रहे प्रभावशाली नेता..!
सम्राट चौधरी बिहार के नए मुख्यमंत्री हुए जिनके साथ दो मंत्री पद के नेताओं विजेंद्र यादव और विजय चौधरी ने भी शपथ ली। पार्टी में तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद तीनों मुख्य शीर्ष नेता ओबीसी समाज से चुना जाना कुछ और इशारा कर रहा। भाजपा हाईकमान का विजय सिन्हा जैसों को बिहार में दरकिनार करना अब सवर्ण तबके को चुभ रहा। ओबीसी नेता सम्राट के नाम पर मुहर लगते ही बिहार में लालू प्रसाद एक बार फिर चर्चा में आ गए क्युकि सम्राट चौधरी उन्ही के चेले रहे है और कभी खास पसंद थे। सम्राट अपने लिए कराई जा रही जातिवादी लॉबिंग में सफल साबित हुए। बिहार ऐसा राज्य है जहां राजद और कांग्रेस ने दशकों राज किया। लालू नीतीश आए दशकों से कांग्रेस का नाम लेवा नहीं बचा। छोटे भाई की उपेक्षापूर्ण भूमिका निभाते निभाते कांग्रेस घटते घटते ओवैसी के समान पांच सीट पर आ गई। यही हाल बीजेपी का भी भविष्य में होगा क्युंकि वहीं गलती दुहराई जा रही जो कांग्रेस दुहरा चुकी है। बिहार में बीजेपी हमेशा कुछ सीटों पर चुनाव जीती, लेकिन अध्यक्ष सुशील कुमार मोदी कभी भी सरकार बनाने के करीब नहीं पहुंच पाए। जहां तक सम्राट चौधरी की बात है, वे जुझारू दबंग युवा नेता हैं। विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान अमित शाह ने जब सभा मंच से आह्वान किया था तो जानकार समझ गए थे कि कुछ ही दिनों में सम्राट सीएम बनेंगे। अमित शाह ने चुनावी मंच से कहा था कि सम्राट और बीजेपी को जिताइये, सम्राट को प्रदेश में बड़ी जिम्मेदारी निभानी है। भाजपा किसी एक सर्वमान्य नेता के उदय को लेकर पूरी तरह उत्सुक नहीं दिख रही है, क्योंकि इससे पार्टी का आंतरिक शक्ति-संतुलन प्रभावित हो सकता है। आजादी मिलने के 79 वर्ष बाद बिहार में बीजेपी के नेतृत्व वाली कोई सरकार पहली बार बन रही है । बेहद अनुभवी नीतीश कुमार के बहुत लम्बे कार्यकाल की विदाई हुई। नीतीश बिहार छोड़कर पहले भी केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल रहे हैं। इस बार उनके लिए कौन सा रोल शाह मोदी ने लिखा है, शीघ्र पता चल जाएगा । फिलहाल वे राज्यसभा की शोभा तो बन ही गए हैं। महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस की वापसी के बाद सम्राट का मुख्यमंत्री बनना एक बड़ी घटना है । इनके नाम पर आम सहमति बनाने में भारतीय जनता पाटी को दिन में तारे देखने के लिए विवश होना पड़ा। पार्टी में व्यापक अंतर्विरोध के कारण आखिर तक सस्पेंस बनाए रखना लाचारी बन गई। नीतीश इस बात के लिए अड़ गए कि ओबीसी छोड़ अगर किसी और को मुख्यमंत्री बनाया तो इस्तीफा नहीं देंगे। बीजेपी नेतृत्व की सांसें थम सी गई। आखिर तक रहस्य बने रहने की वजह यही लोबिंग बनी। पर्यवेक्षक के रूप में शिवराज सिंह चौहान और पार्टी अध्यक्ष नितिन नबीन को भेजकर अंततः बीजेपी ने विधायक दल बैठक में सर्वसम्मति से पुनः सम्राट चौधरी को विधायक दल नेता चुनवाया। सम्राट पहले ही से विधानसभा में पार्टी विधायक दल के नेता और उपमुख्यमंत्री रहे हैं। ऐसे में नये सिरे से विधायक दल नेता चुने जाने की परंपरा का निर्वाह इसलिए किया गया क्योंकि पुरानी सरकार अब नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद भंग हो चुकी है। विधायक दल नेता चुने जाने की प्रक्रिया के दौरान विजय कुमार सिन्हा ने ही सम्राट चौधरी के नाम का प्रस्ताव पेश किया और मंगल पांडेय तथा दिलीप जायसवाल ने अनुमोदन किया।
इससे पहले पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने बातों बातों में बता दिया था कि “गठबंधन की सरकार है। सिर्फ बीजेपी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार नहीं कि उन राज्यों जैसा प्रयोग किया जा सके। बिहार में हम गठबंधन की डोर से बंधे हैं इसलिए कोई प्रयोग नहीं कर सकते”।
सवाल तो अब भी अनसुलझे हैं। मगर सत्ता हस्तांतरण की औपचारिकता पूरी हो गई। अब नये सम्राट को उन चुनौतियों पर खरा उतरना होगा जो पार्टी के व्यापक अंतर्विरोध से सामने आई हैं। उन्हें अपनी साख स्थापित करनी होगी। सबसे बड़ा सम्राट नहीं, सबका और पार्टी जनों व सवर्णो का सगा बनना होगा वरना मोहन यादव जैसे ना निगले जा सकेंगे ना उगले जा सकेंगे।







