राजकुमार कुम्भज, इन्दौर
(नया अध्याय, देहरादून)
फूल खिलते हैं.
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फूल खिलते हैं, खिलते रहेंगे
पेट पत्थरों का चीरकर भी खिलेंगे
सदियों-सदियों तक चलता रहेगा
कमोबेश ये सिलसिला यूँ ही-यूँ ही
यहीं-कहीं नाचती-गाती मिलती हैं
नन्हीं-नन्हीं टुकड़ियाँ देवताओं की
जिन्हें, भिन्न-भिन्न रँगों से रचते हैं बच्चे
संसार भर में खुशबू बिखेरते हुए
खेलते-खेलते, कभी कुछ रखते हैं याद
भूल जाते हैं कभी-कुछ.
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